भक्ति के आकाश का टूटा एक दैवीय तारा: साध्वी प्रेम बाईसा का देवलोक गमन, त्याग और तपस्या के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत
सनातन धर्म की अलख जगाने वाली, त्याग और तप की प्रतीक साध्वी प्रेम बाईसा का जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में निधन हो गया। कथावाचक के रूप में प्रसिद्ध इस महान साध्वी ने जीवनभर धर्म सेवा की और संघर्षों के बीच भी अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।

धर्म की अलख जगाने वाली कथावाचक का देहावसान, साधना अमर हुई
सनातन धर्म की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाली, त्याग, तप और भक्ति की जीवंत प्रतिमूर्ति साध्वी प्रेम बाईसा अब हमारे बीच नहीं रहीं। जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही राजस्थान सहित देशभर में शोक की लहर दौड़ गई। साध्वी प्रेम बाईसा का जीवन केवल साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने अपने कथावाचनों और तपस्वी आचरण के माध्यम से सनातन धर्म की चेतना को जन-जन तक पहुंचाया।
अंतिम समय और अस्पताल की पुष्टि
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, साध्वी प्रेम बाईसा को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के चलते जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उपचार के दौरान उन्होंने शांत भाव से देह त्याग दिया। चिकित्सकों ने उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि की। उनके अंतिम क्षणों में शिष्यों और अनुयायियों की प्रार्थनाएं अस्पताल परिसर में गूंजती रहीं।
कथावाचक से साधना की शिखर तक
साध्वी प्रेम बाईसा को सनातन धर्म में एक प्रभावशाली कथावाचक के रूप में विशेष पहचान मिली। उनके प्रवचन केवल धार्मिक आख्यान नहीं होते थे, बल्कि उनमें सामाजिक चेतना, नैतिकता और आत्मशुद्धि का गहरा संदेश समाहित रहता था। उन्होंने:
- श्रीराम कथा
- श्रीमद्भागवत कथा
- सनातन मूल्यों पर आधारित प्रवचन के माध्यम से हजारों श्रद्धालुओं को धर्म के मार्ग से जोड़ा। उनकी वाणी में सरलता और भाव में गहराई थी, जिसने उन्हें आम जनमानस से जोड़ दिया।
संघर्षों से भरा जीवन
साध्वी प्रेम बाईसा का जीवन केवल भक्ति और साधना का ही नहीं, बल्कि संघर्ष और पीड़ा का भी साक्षी रहा। धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में उन्होंने न्याय की गुहार लगाई, लेकिन उन्हें लंबे समय तक न्याय के दर-दर भटकना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने धर्म, तप और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
सूत्रों के अनुसार, उन्होंने अपने जीवन में कई बार अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई, लेकिन उनकी शांत साधना और धैर्य ही उनकी पहचान बना रहा। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी, परंतु सनातन धर्म की सेवा से पीछे नहीं हटीं।
सनातन धर्म के लिए अमूल्य योगदान
साध्वी प्रेम बाईसा को सनातन धर्म की अलख जगाने वाली साध्वी के रूप में स्मरण किया जाएगा। उनके योगदान में शामिल रहे:
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में धर्म प्रचार
- युवाओं को संस्कार और साधना से जोड़ना
- महिला साध्वियों के लिए प्रेरणास्रोत बनना
- भक्ति और सेवा के संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करना
उनका जीवन इस बात का प्रमाण रहा कि सच्ची साधना केवल आश्रमों तक सीमित नहीं होती, बल्कि समाज के बीच रहकर भी की जा सकती है।
शिष्यों और अनुयायियों में शोक
उनके निधन के बाद आश्रमों और धार्मिक संस्थानों में शोक सभाओं का आयोजन किया जा रहा है। शिष्यों का कहना है कि साध्वी प्रेम बाईसा केवल गुरु नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और मातृवत व्यक्तित्व थीं। उनके अनुयायियों ने उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया।
अंतिम दर्शन और संस्कार
परंपरागत विधि-विधान के अनुसार, साध्वी प्रेम बाईसा के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा, जहां श्रद्धालु उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। अंतिम संस्कार धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न किया जाएगा।
साध्वी प्रेम बाईसा का देहावसान सनातन धर्म के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, लेकिन उनके विचार, तपस्या और धर्म के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। त्याग, तप और भक्ति की यह मूरत अब स्मृतियों में नहीं, बल्कि सनातन चेतना में सदा जीवित रहेगी।

Pratahkal Hub
प्रातःकाल हब, दै.प्रातःकाल की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा प्रातःकाल हब राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।"
