धधकते अंगारों पर भक्ति का नृत्य, मरुधरा की माटी में वीरता का जीवंत दृश्य! राजस्थान महोत्सव में कलाकारों ने रचा हैरतअंगेज इतिहास
राजस्थान महोत्सव 2026 में बीकानेर के कलाकारों ने धधकते अंगारों पर अग्नि नृत्य कर दुनिया को हैरान कर दिया। 'फतेह-फतेह' के उद्घोष के साथ जसनाथी सिद्धों ने मरुधरा की इस प्राचीन और साहसी परंपरा को जीवंत किया। इस अद्भुत सांस्कृतिक उत्सव, कलाकारों के अनुभव और आयोजन की पूरी रिपोर्ट यहाँ विस्तार से पढ़ें।

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अदम्य साहस के लिए विश्व विख्यात है। इसी परंपरा को जीवंत करते हुए राजस्थान महोत्सव के भव्य आयोजन के दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने दर्शकों की सांसें थाम दीं। बीकानेर के कतरियासर से आए सिद्ध कलाकारों ने जब धधकते हुए अंगारों के ढेर, जिसे स्थानीय भाषा में 'धुणा' कहा जाता है, पर नृत्य करना शुरू किया, तो वहां मौजूद हजारों लोग इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बने। यह केवल एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि जसनाथी संप्रदाय की गहरी आस्था और योग साधना का एक ऐसा संगम था, जिसे देखकर आधुनिक विज्ञान भी निरुत्तर नजर आता है।
इस महोत्सव की मुख्य घटना उस समय शुरू हुई जब आयोजन स्थल के बीचों-बीच खेजड़ी की लकड़ियों से दहकते हुए अंगारों का एक विशाल ढेर तैयार किया गया। महोत्सव के मुख्य समन्वयक अशोक सिंह राजपुरोहित के निर्देशन में जैसे ही नगाड़ों की थाप गूंजी, कलाकारों ने 'फतेह-फतेह' के उद्घोष के साथ अंगारों की ओर कदम बढ़ा दिए। प्रमुख कलाकार मदन नाथ सिद्ध और उनके साथी कलाकारों, जिनमें श्रवण नाथ और गोपीराम शामिल थे, ने नंगे पैर दहकते अंगारों पर ऐसे नृत्य किया जैसे वे मखमल के बिस्तर पर चल रहे हों। कलाकारों ने न केवल उन पर नृत्य किया, बल्कि जलते हुए कोयलों को अपने मुंह में भरा और उन्हें हवा में उछालकर 'मतीरा फोड़ना' जैसी कठिन रस्मों को अंजाम दिया।
प्रशासनिक और आधिकारिक स्तर पर इस आयोजन की भव्यता को सुनिश्चित करने के लिए जिला कलेक्टर भगवती प्रसाद कलाल और पर्यटन विभाग के निदेशक डॉ. रश्मि शर्मा ने विशेष प्रबंध किए थे। सुरक्षा मानकों का ध्यान रखते हुए कार्यक्रम स्थल पर चिकित्सा दल और अग्निशमन यंत्रों की तैनाती की गई थी। अधिकारियों ने बताया कि इस अग्नि नृत्य का उद्देश्य लुप्त होती लोक कलाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करना और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है। आयोजन के दौरान कलाकारों की अद्भुत सहनशक्ति को देख मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित स्थानीय विधायक जेठानंद व्यास ने इसे ईश्वरीय कृपा और वर्षों के कठिन अभ्यास का परिणाम बताया।
तकनीकी और सांस्कृतिक बारीकियों पर नजर डालें तो यह नृत्य जसनाथी संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा गुरु जसनाथ जी की स्मृति में किया जाता है। महोत्सव में आए सांस्कृतिक विशेषज्ञ डॉ. महेंद्र भानावत ने विस्तार से बताया कि कैसे ये कलाकार एक विशेष ध्यान की अवस्था में जाने के बाद ही अंगारों पर उतरते हैं। इस दौरान मंच संचालन कर रहे उद्घोषक किशोर सिंह ने कलाकारों के परिचय के साथ-साथ इस कला के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। कलाकारों की इस टोली में युवा कलाकार राहुल नाथ ने भी अपनी प्रस्तुति से सबका ध्यान खींचा, जो यह दर्शाता है कि यह प्राचीन विधा आज भी युवाओं के बीच उतनी ही लोकप्रिय है।
निष्कर्षतः, राजस्थान महोत्सव का यह संस्करण न केवल रंग-बिरंगी वेशभूषा और लोक गीतों का संगम रहा, बल्कि इसने राजस्थान के शौर्य और साहस की उस कहानी को भी दोहराया जो पीढ़ियों से चली आ रही है। धधकते अंगारों पर कलाकारों की वह मुस्कान और निडरता इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति जब आस्था से जुड़ती है, तो वह चमत्कार का रूप ले लेती है। इस आयोजन ने न केवल पर्यटन को बढ़ावा दिया है, बल्कि मरुधरा की इस दुर्लभ लोक कला को वैश्विक मानचित्र पर एक नई पहचान और सम्मान भी दिलाया है।

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