जानिए कैसे एचएमटी के दौर में जेरक्सेस देसाई और जेआरडी टाटा ने मिलकर रखी टाइटन की बुनियाद। सरकारी बाधाओं को पार कर दुनिया की सबसे पतली घड़ी और तनीष्क ब्रांड बनाने की यह रोमांचक दास्तान अब आ रही है पर्दे पर, जो आपको हैरान कर देगी।

लॉन्ग-वेरिएबल क्वार्ट्ज घड़ियों से भारतीय बाजार में क्रांति लाने वाले और टाटा समूह की सबसे मूल्यवान कंपनियों में से एक, टाइटन के संस्थापक प्रबंध निदेशक जेरक्सेस देसाई की प्रेरक यात्रा एक बार फिर चर्चा में है। अमेज़न एमएक्स प्लेयर (प्राइम वीडियो) पर रिलीज हुई सीरीज 'मेड इन इंडिया - अ टाइटन स्टोरी' के जरिए इस विजनरी बिजनेसमैन के संघर्ष और सफलता की अनकही कहानी को देश के सामने लाया गया है। रोबी ग्रेवाल के निर्देशन में बनी यह सीरीज विनय कामथ की किताब 'टाइटन: इनसाइड इंडियाज मोस्ट सक्सेसफुल कंज्यूमर ब्रांड' पर आधारित है। इस सीरीज में अभिनेता जिम सरभ ने जेरक्सेस देसाई और नसीरुद्दीन शाह ने जे.आर.डी. टाटा की मुख्य भूमिका निभाई है, जो इस ऐतिहासिक ब्रांड के बनने की जटिल प्रक्रिया को जीवंत करती है।

वर्ष 1937 में एक पारसी परिवार में जन्मे जेरक्सेस देसाई ने मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की थी। इसके बाद वर्ष 1961 में वे टाटा प्रशासनिक सेवाओं (टीएएस) से जुड़े और समूह की विभिन्न कंपनियों में अपनी सेवाएं दीं। 1970 के दशक में जब वे टाटा प्रेस का नेतृत्व कर रहे थे, तब उनके मन में भारत का अपना विश्वस्तरीय वॉच ब्रांड बनाने का विचार आया। उस दौर में भारतीय घड़ी बाजार पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएमटी (HMT) का पूरी तरह दबदबा था। देसाई ने अपना यह अनूठा विचार जे.आर.डी. टाटा के सामने रखा, जिन्होंने इस विज़न को पूरा समर्थन दिया। हालांकि, तत्कालीन कठोर कड़े नियमों और लाइसेंसिंग से जुड़ी सरकारी व नौकरशाही बाधाओं के कारण इस परियोजना को अमलीजामा पहनाने में कई साल का लंबा वक्त लग गया।



आखिरकार वर्ष 1986 में टाटा समूह और तमिलनाडु औद्योगिक विकास निगम (टिड्को) के बीच एक संयुक्त उद्यम के रूप में टाइटन की आधिकारिक शुरुआत हुई। इसका मुख्य विनिर्माण संयंत्र तमिलनाडु के होसुर में स्थापित किया गया। जेरक्सेस देसाई के कुशल नेतृत्व में टाइटन ने पारंपरिक घड़ियों की जगह अत्याधुनिक क्वार्ट्ज घड़ियों को भारतीय उपभोक्ताओं से परिचित कराया, जिसने बेहद कम समय में इसे एक घरेलू नाम बना दिया। देसाई का विज़न सिर्फ घड़ियों तक सीमित नहीं रहा; उन्होंने बाद में 'तनीष्क' ब्रांड की स्थापना की, जिसने भारत के असंगठित आभूषण बाजार को पूरी तरह से बदलकर रख दिया। नवाचार के प्रति उनकी दीवानगी का सबसे बड़ा उदाहरण 'टाइटन एज' है, जो तब अस्तित्व में आया जब देसाई ने अपने इंजीनियरों को दुनिया की सबसे पतली घड़ी बनाने की चुनौती दी। इसके परिणामस्वरूप 1.15 मिमी की मूवमेंट और 3.5 मिमी केस वाली ऐतिहासिक घड़ी साल 2002 में लॉन्च की गई।

जेरक्सेस देसाई वर्ष 2002 में टाइटन से सेवानिवृत्त हुए और कमान उनके करीबी भास्कर भट को सौंपी गई। उनके इस अद्वितीय योगदान के लिए वर्ष 2006 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (एनआईडी) द्वारा उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे सामाजिक रूप से सक्रिय रहे और नंदन नीलेकणी की पहल वाले 'इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स' से जुड़े। लगभग 30 वर्षों तक बेंगलुरु को अपना आशियाना बनाने वाले देसाई का 27 जून 2016 को 79 वर्ष की आयु में बीमारी के कारण निधन हो गया। आज टाइटन भले ही घड़ियों, आभूषणों, चश्मों और फैशन एक्सेसरीज के क्षेत्र में एक विशाल साम्राज्य बन चुका है, लेकिन इसकी हर सफलता के पीछे जेरक्सेस देसाई का वह मजबूत विज़न ही है जिसने एक भारतीय ब्रांड को वैश्विक पहचान दिलाई।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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