नई दिल्ली: डिजिटल युग में डेटा को 'नया तेल' माना जाता है, लेकिन जब यह डेटा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम बन जाए, तो संप्रभुता का सवाल सबसे ऊपर आता है। भारत सरकार ने अब एक ऐसा ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए हैं जो वैश्विक तकनीकी जगत की नींव हिला सकता है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय एक ऐसी नीति पर विचार कर रहा है जिसके तहत भारत में काम करने वाले स्मार्टफोन निर्माताओं के लिए अपने उपकरणों का 'सोर्स कोड' (Source Code) साझा करना अनिवार्य हो सकता है। यह कदम देश की तकनीकी संप्रभुता को सुरक्षित करने और विदेशी हार्डवेयर में छिपे संभावित 'बैकडोर' या जासूसी के खतरों को खत्म करने की दिशा में एक निर्णायक प्रहार माना जा रहा है।

इस नीतिगत बदलाव की सुगबुगाहट तब तेज हुई जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के बीच एक उच्च स्तरीय बैठक संपन्न हुई। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में सीमावर्ती देशों से जुड़े मोबाइल हैंडसेट और उनमें प्री-इंस्टॉल्ड आने वाले चीनी ऐप्स के जरिए होने वाली डेटा चोरी पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। सरकार का तर्क है कि बिना सोर्स कोड की जांच के यह सुनिश्चित करना असंभव है कि कोई उपकरण भारतीय नागरिकों की गोपनीयता का उल्लंघन नहीं कर रहा है। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी एस. कृष्णन ने संकेत दिए हैं कि नई नीति के तहत निर्माताओं को एक 'विश्वसनीय स्रोत' (Trusted Source) की श्रेणी में आने के लिए अपने सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर को सरकारी ऑडिट के लिए खोलना होगा।

कानूनी पहलुओं की बात करें तो, प्रस्तावित फ्रेमवर्क को 'राष्ट्रीय सुरक्षा निर्देश' (National Security Directive) के तहत लागू किया जा सकता है। इसमें विशेष रूप से सैमसंग, एप्पल और शाओमी जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए कड़े प्रावधान होने की संभावना है। हालांकि, तकनीकी विश्लेषक और कानूनी विशेषज्ञ जैसे पवन दुग्गल ने आगाह किया है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार संधियों और बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के साथ टकराव पैदा कर सकता है। स्मार्टफोन निर्माता कंपनियां अपनी व्यापारिक गोपनीयता का हवाला देते हुए इस प्रस्ताव का विरोध कर रही हैं। उद्योग संगठन 'आईसीईए' (ICEA) के अध्यक्ष पंकज महिंद्रू ने भी पहले कई मंचों पर यह चिंता जताई है कि सोर्स कोड साझा करने से नवाचार और प्रतिस्पर्धा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच, गृह मंत्रालय के साइबर सुरक्षा विंग के प्रमुख राजेश पंत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा के मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। सरकार का मानना है कि जब तक हमारे पास महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों की कोडिंग तक पहुंच नहीं होगी, तब तक हम पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। यह नीति न केवल हार्डवेयर बल्कि ऑपरेटिंग सिस्टम के भीतर छिपे उन 'किल स्विच' और 'स्पायवेयर' की पहचान करने में मदद करेगी जो संकट के समय देश के संचार तंत्र को पंगु बना सकते हैं।

भारत का यह कदम वैश्विक स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे रहा है। यदि यह कानून धरातल पर उतरता है, तो भारत दुनिया का पहला ऐसा प्रमुख लोकतंत्र बन जाएगा जो स्मार्टफोन के बंद दरवाजों के पीछे छिपी कोडिंग की चाबी मांगेगा। यह निर्णय केवल तकनीकी सुरक्षा का नहीं, बल्कि डिजिटल उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत की आत्मनिर्भरता का उद्घोष है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि एप्पल जैसी कंपनियां, जो अपनी गोपनीयता के लिए जानी जाती हैं, भारत के इस 'सुरक्षा कवच' के सामने किस तरह का रुख अख्तियार करती हैं।

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