भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था अगले सात से आठ वर्षों में मौजूदा करीब 9 अरब डॉलर के मूल्यांकन से बढ़कर 40 से 45 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में यह संभावना जताते हुए निजी निवेश बढ़ाने, नियामकीय मंजूरियों में तेजी लाने और वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को तकनीकी क्षमताओं का प्रदर्शन करने से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाली अंतरिक्ष कंपनियां विकसित करने पर ध्यान देना होगा।

नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम की ओर से आयोजित “स्पेस, सॉवरेन्टी एंड न्यू इकोनॉमी” विषयक मीडिया राउंडटेबल में डॉ. सिंह ने कहा कि वर्ष 2019-2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोले जाने के महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं। अब विकास के अगले चरण में तकनीकी उपलब्धियों को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य कारोबार में बदलना जरूरी होगा।

मंत्री ने निवेश आकर्षित करने और भारतीय अंतरिक्ष उद्यमों की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहुंच बढ़ाने के लिए स्थिर एवं अनुमानित मांग, नियामकीय मंजूरियों में तेजी, कारोबार की लागत कम करने और टिकाऊ व्यावसायिक मॉडल विकसित करने को प्रमुख कारक बताया। उन्होंने कहा कि सरकार का सहयोग इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की क्षमताओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

डॉ. सिंह के अनुसार, सरकारी संस्थानों को प्रमुख ग्राहक के रूप में स्थापित करना और प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट परियोजनाओं के लिए सहायता उपलब्ध कराना निजी कंपनियों के लिए उपयोगी होगा। इससे कंपनियां अपनी तकनीकों की प्रभावशीलता प्रदर्शित कर सकेंगी, बाजार के लिए तैयार उत्पाद विकसित कर पाएंगी और आय के स्थायी स्रोत स्थापित कर सकेंगी।

उन्होंने आपूर्ति शृंखला के बेहतर एकीकरण तथा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाने की जरूरत भी रेखांकित की। साथ ही, राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने पर जोर दिया।

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि उपग्रह संचार, भू-स्थानिक सेवाएं और पृथ्वी अवलोकन जैसी तकनीकें बुनियादी ढांचे की निगरानी, कृषि, आपदा प्रबंधन और रक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रही हैं। उन्होंने विकास परियोजनाओं की निगरानी, उनके क्रियान्वयन की समय-सीमा पर नजर रखने और सार्वजनिक कार्यों की जियो-टैगिंग में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग का भी उल्लेख किया।

डॉ. सिंह ने यह भी बताया कि भारत म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित पड़ोसी देशों को अंतरिक्ष आधारित सूचनाएं और आपदा प्रबंधन संबंधी सहायता उपलब्ध कराने में भूमिका निभा रहा है। उनके मुताबिक, अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश बढ़ाने, तकनीक विकसित करने और भारतीय कंपनियों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़ने के लिए सरकारी संस्थानों, निजी उद्यमों और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण होगा।

इस राउंडटेबल में अंतरिक्ष उद्योग, उद्यमिता, अकादमिक जगत और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। अन्य प्रतिभागियों में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) के निदेशक (प्रमोशन) विनोद कुमार तथा STEMBoard और LINGO की संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी आयशा बोवे शामिल थीं। आयशा बोवे नासा की पूर्व इंजीनियर और ब्लू ओरिजिन की अंतरिक्ष यात्री भी हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र की भविष्य की वृद्धि तकनीकी क्षमताओं, व्यावसायिक नवाचार, प्रभावी नियमन और निजी भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाने पर निर्भर करेगी। अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को 40 से 45 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य हासिल करने के लिए निजी निवेश, बाजार विस्तार और व्यावसायिक क्षमता का विकास निर्णायक होगा।

Pratahkal Bureau

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