SA National Cricket Team : दक्षिण अफ्रीका में मिली पराजय ने भारतीय टेस्ट टीम की कमजोरियां एक बार फिर उजागर कर दी हैं। जिस प्रारूप को क्रिकेट का सबसे कठिन स्कूल कहा जाता है, वहां बुनियादी गलतियों को सुधारने की कोई गुंजाइश नहीं होती, और भारत यह सबक बार-बार कड़वे अनुभवों के साथ सीख रहा है। इस हार ने चयन समिति को मजबूर किया है कि वह टेस्ट विशेषज्ञता की ओर फिर से लौटने की संभावना तलाशे, खासकर उस अहम तीसरे नंबर के लिए, जिसे दशकों तक राहुल द्रविड़ और चेतेश्वर पुजारा जैसे भरोसेमंद नामों ने संभाला था।

वर्तमान बल्लेबाजी क्रम इस स्थिरता को दोबारा हासिल नहीं कर पाया है। करुण नायर इंग्लिश परिस्थितियों में संघर्ष करते दिखे और बी. साई सुदर्शन ने ग्यारह पारियों में 27 की औसत के साथ यह संकेत दिया कि उन्हें अभी घरेलू स्तर पर और परिपक्वता हासिल करनी है। तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण उपमहाद्वीपीय विकेटों पर उनकी कमियां और स्पष्ट हुई हैं। चयनकर्ताओं का मानना है कि इस स्तर की तैयारी केवल घरेलू क्रिकेट और भारत ‘ए’ के दौरों से ही संभव है, टेस्ट मैदान पर नहीं।

टीम के भीतर विशेषज्ञों की मांग पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। कुछ अनुभवी घरेलू खिलाड़ियों के लिए रास्ते संकरे हो चुके हैं, लेकिन कुछ नाम अब भी चयनकर्ताओं और टीम प्रबंधन की निगाह में हैं। इनमें रुतुराज गायकवाड़, रजत पाटीदार और रिंकू सिंह शामिल हैं, जो घरेलू क्रिकेट में निरंतर प्रदर्शन और मानसिक मजबूती के कारण स्थिर विकल्प माने जा रहे हैं। गायकवाड़ इस सत्र में उत्कृष्ट फॉर्म में रहे हैं और तीसरे नंबर के मजबूत दावेदार के रूप में देखे जा रहे हैं। पाटीदार चोट के कारण हाल में क्रिकेट से दूर रहे, लेकिन उनके 74 प्रथम श्रेणी मैचों में 45 से अधिक के औसत को अनदेखा करना आसान नहीं होगा। वहीं रिंकू सिंह लगभग 60 के शानदार प्रथम श्रेणी औसत के साथ चयन समीकरण में प्रभावी नाम बने हुए हैं।

युवा खिलाड़ियों पर निवेश का विचार कागजों पर जितना आकर्षक लगता है, मैदान पर उतना सफल नहीं रहा। दक्षिण अफ्रीका श्रृंखला में यह साफ दिखा कि अनुभव की कमी टीम पर भारी पड़ी। इसी पृष्ठभूमि में लाल गेंद के नए उभरते बल्लेबाज स्मरण रविचंद्रन और यश राठौड़ ने भी चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा है। रविचंद्रन का प्रथम श्रेणी औसत 78 और राठौड़ के पिछले रणजी सत्र के 960 रन उन्हें भविष्य के संभावित मध्यक्रम विकल्पों में शामिल करते हैं।

हालांकि टीम मैनेजमेंट द्वारा ऑलराउंडरों की भूमिका को लेकर लगातार प्रयोग किए गए, परंतु आंकड़े बताते हैं कि यह रणनीति अक्सर टिकाऊ नहीं रही। कई खिलाड़ियों में दोनों विभागों में संतुलित कौशल का अभाव दिखाई दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि टेस्ट क्रिकेट में भरोसा उन्हीं पर किया जाना चाहिए जो अपने प्राथमिक कौशल में सिद्ध हैं।

अब नजर इस पर टिकी है कि चयन समिति और टीम मैनेजमेंट किस दिशा में कदम बढ़ाते हैं। क्या अनुभवी घरेलू बल्लेबाजों को दोबारा मौका मिलेगा या युवाओं को आगे बढ़ाने का प्रयोग जारी रहेगा—इसका जवाब समय देगा। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में मिली करारी शिकस्त ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि भारत को अपनी टेस्ट टीम की नींव को दोबारा मजबूती देने की आवश्यकता है, और यह काम केवल विशेषज्ञता और स्थिरता के साथ ही संभव है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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