भारतीय हॉकी टीम की जर्सी का रंग बदलने का मामला इन दिनों खेल गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक में एक बड़ी बहस का विषय बन चुका है। अगले महीने बेल्जियम और नीदरलैंड्स में आयोजित होने वाले आगामी एफआईएच हॉकी विश्व कप से ठीक पहले, भारतीय पुरुष और महिला टीमों की पारंपरिक नीली जर्सी को बदलकर केसरिया रंग में तब्दील कर दिया गया है। हॉकी इंडिया के इस चौंकाने वाले फैसले के सामने आते ही खेल जगत में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है, जहां एक तरफ संस्था इसे पूरी तरह से तकनीकी आवश्यकता बता रही है, वहीं दूसरी तरफ खिलाड़ियों और पूर्व दिग्गजों ने इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब हॉकी इंडिया ने आधिकारिक घोषणा की कि राष्ट्रीय टीमें विश्व कप के दौरान नीले रंग की बजाय केसरिया रंग की जर्सी पहनकर मैदान पर उतरेंगी। इस बदलाव के पीछे मुख्य तर्क यह दिया गया कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं में एस्ट्रो टर्फ का मानक रंग नीला होता है। शासी निकाय का दावा है कि पारंपरिक नीली जर्सी नीले टर्फ के साथ घुल-मिल जाती है, जिससे खिलाड़ियों को मैदान पर अपने साथी खिलाड़ियों को ढूंढने और विजिबिलिटी में तकनीकी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। हॉकी इंडिया का यह भी कहना रहा है कि यह निर्णय कोचों, खिलाड़ियों और सहयोगी स्टाफ के साथ विस्तृत विचार-विमर्श और उनकी सिफारिशों के आधार पर ही लिया गया है।

हालांकि, इन आधिकारिक दावों के विपरीत जमीन पर स्थिति काफी अलग नजर आती है। मीडिया रिपोर्ट्स और खिलाड़ियों के बयानों के अनुसार, टीम से जुड़े कई सदस्यों ने इस पूरी परामर्श प्रक्रिया को सिरे से खारिज कर दिया है। खिलाड़ियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस प्रकार के किसी भी बड़े बदलाव को लेकर उनसे कभी कोई रायशुमारी नहीं की गई थी और न ही उन्हें इस चर्चा का हिस्सा बनाया गया था। स्थिति तब और पेचीदा हो गई जब हॉकी इंडिया की कार्यकारी समिति के कुछ वरिष्ठ सदस्यों ने भी यह स्वीकार किया कि उन्हें जर्सी के रंग में किए गए इस बदलाव की कोई पूर्व सूचना नहीं थी और न ही इस संबंध में बुलाई गई किसी आधिकारिक बैठक में उन्हें शामिल किया गया था।

इस पूरे घटनाक्रम पर भारतीय हॉकी के पूर्व दिग्गज खिलाड़ियों ने भी तीखी नाराजगी और हैरानी व्यक्त की है। पूर्व कप्तान वीरेन रासकिन्हा ने सार्वजनिक रूप से इस बदलाव पर सवाल उठाते हुए इसे भारतीय हॉकी की पारंपरिक पहचान और विरासत के विपरीत बताया। उनका कहना था कि भारतीय टीम लंबे समय से नीली जर्सी के साथ जुड़ी रही है और देश-विदेश के खेलप्रेमी अपनी टीम को इसी रूप में देखना पसंद करते हैं। इसके अलावा, अन्य पूर्व कप्तानों और खिलाड़ियों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि जर्सी जैसे संवेदनशील और पहचान से जुड़े प्रतीकों पर निर्णय लेने से पहले पारदर्शिता बरती जानी चाहिए थी।

जैसे-जैसे विश्व कप की शुरुआत नजदीक आ रही है, यह मुद्दा केवल एक जर्सी के रंग तक सीमित न रहकर खेल प्रशासन, पारदर्शिता और खिलाड़ियों के अधिकारों से जुड़ी एक बड़ी बहस बन चुका है। एक तरफ जहां हॉकी इंडिया इसे तकनीकी सुधार और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बताकर बचाव की मुद्रा में है, वहीं दूसरी तरफ अंदरूनी असंतोष और पूर्व खिलाड़ियों के कड़े विरोध ने इस पूरे निर्णय को एक गंभीर विवाद के घेरे में ला खड़ा किया है। आगामी टूर्नामेंट में टीम के प्रदर्शन के साथ-साथ इस प्रशासनिक और पहचान से जुड़े विवाद पर भी सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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