9 वर्ल्ड कप, हजारों यादें; जाने फुटबॉल दीवानगी की अनसुनी कहानी 'World Cup fever'
“साइमन कूपर की किताब ‘वर्ल्ड कप फीवर’ 1990–2022 के नौ वर्ल्ड कप के अनुभवों के जरिए फुटबॉल के पीछे छिपी राजनीति, भ्रष्टाचार और ‘स्पोर्ट्सवॉशिंग’ का चौंकाने वाला खुलासा करती है।”

World Cup Fever Simon Kuper Review
World Cup Fever: A Footballing Journey in Nine Tournaments : खेल की दुनिया में जब 'फुटबॉल विश्व कप' का नाम आता है, तो जहन में रोमांच, जुनून और मैदान पर पसीना बहाते खिलाड़ियों की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या यह केवल एक खेल है? या फिर वैश्विक राजनीति और पूंजीवाद का एक ऐसा चक्रव्यूह, जहाँ पर्दे के पीछे की कहानी मैदान के स्कोरबोर्ड से कहीं ज्यादा सनसनीखेज है? प्रसिद्ध लेखक और फाइनेंशियल टाइम्स के स्तंभकार साइमन कूपर की नई पुस्तक 'वर्ल्ड कप फीवर' (World Cup Fever) ने फुटबॉल जगत के उन्हीं अनछुए और विवादित पहलुओं को उजागर किया है, जो आमतौर पर प्रशंसकों की नज़रों से ओझल रहते हैं।
साइमन कूपर ने 1990 से लेकर अब तक के हर विश्व कप का व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। पिछले 32 वर्षों की इस सजीव यात्रा को उन्होंने एक डायरी के रूप में संजोया है, जो न केवल मैचों का रोमांच बताती है, बल्कि उन देशों की संस्कृतियों और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था का आइना भी दिखाती है। पुस्तक में इस बात का गहराई से विश्लेषण किया गया है कि कैसे शुरुआती पांच टूर्नामेंट विकसित देशों तक सीमित थे, लेकिन बाद में ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, रूस और कतर जैसे देशों में इसका आयोजन खेल के 'लोकतंत्रीकरण' से ज्यादा बहुराष्ट्रीय पूंजीवाद और वैश्विक दक्षिण (Global South) पर आक्रमण की तरह नजर आता है।
लेखक ने फीफा (FIFA) की बोली प्रक्रिया और उसमें शामिल भारी भरकम धन राशि के लेन-देन पर तीखे सवाल उठाए हैं। कूपर के अनुसार, विश्व कप की मेजबानी हासिल करना अब केवल खेल का आयोजन नहीं, बल्कि किसी राष्ट्र की प्रतिष्ठा और उसकी छवि चमकाने का एक जरिया (Sportswashing) बन गया है। रूस और कतर जैसे देशों का उदाहरण देते हुए पुस्तक बताती है कि कैसे इन निरंकुश शासनों ने मानवाधिकारों के उल्लंघन और श्रम शोषण की खबरों के बावजूद फुटबॉल का इस्तेमाल अपनी वैश्विक ब्रांडिंग के लिए किया। कतर में निर्माण कार्यों के दौरान हुई मजदूरों की मौतें और रूस द्वारा क्रीमिया पर आक्रमण के बावजूद 2018 की मेजबानी मिलना, इस खेल प्रणाली में निहित गहरे पाखंड को दर्शाता है।
पुस्तक में दक्षिण अफ्रीका (2010) के उदाहरण से यह भी स्पष्ट किया गया है कि रंगभेद की आधिकारिक समाप्ति के बावजूद स्टेडियमों और सामाजिक संरचनाओं में श्वेत-अश्वेत का अंतर आज भी कायम है। इसके अलावा, खेल के बढ़ते व्यवसायीकरण पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि 1970 के दशक में 16 टीमों से शुरू हुआ यह सफर 2026 में 48 और 2030 तक 64 टीमों तक पहुँचने वाला है। टीमों की बढ़ती संख्या का सीधा अर्थ है—अधिक विज्ञापन, अधिक टिकट बिक्री और अरबों डॉलर के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स। ब्राजील जैसे देशों में यह आयोजन "राज्य की भ्रष्ट अक्षमता" का प्रतीक बन गया, जहाँ बुनियादी ढांचे पर हुआ भारी खर्च पर्यावरण और श्रम सुरक्षा की कीमत पर किया गया।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
