Satellite : अंतरिक्ष में सालों बिताने के बाद भी सैटेलाइट्स को क्यों जंग नहीं लगता ; जाने अंतरिक्ष का रहस्य
Satellite : अंतरिक्ष में दशकों तक घूमते सैटेलाइट पर कभी जंग क्यों नहीं लगती? पृथ्वी पर महीनों में जंग खा जाने वाली धातु अंतरिक्ष में चमकती रहती है क्योंकि वहाँ न ऑक्सीजन है न नमी। एल्यूमिनियम-टाइटेनियम बॉडी, सोने-निकल की कोटिंग और परफेक्ट सीलिंग – जानिए पूरा विज्ञान जो सैटेलाइट को अमर बनाता है!

Satellite : पृथ्वी से हजारों किलोमीटर ऊपर, शून्य गुरुत्वाकर्षण और भीषण ठंड में दशकों तक निर्बाध चक्कर लगा रहे सैटेलाइट आज भी वैसे ही चमकते हैं जैसे लॉन्च के पहले दिन थे। पृथ्वी पर तो लोहे का एक छोटा सा टुकड़ा भी कुछ महीनों में जंग खा जाता है, लेकिन अंतरिक्ष में अरबों रुपये की ये मशीनें बिना एक धब्बे के सालों-साल टिकी रहती हैं। आखिर इस चमत्कार के पीछे का विज्ञान क्या है?
वैज्ञानिकों के अनुसार, जंग लगने की पूरी प्रक्रिया ही पृथ्वी की देन है। जंग दरअसल लोहे का ऑक्सीकरण है, जो तब होता है जब आयरन धातु ऑक्सीजन और नमी के साथ मिलकर आयरन ऑक्साइड बना लेती है। अंतरिक्ष निर्वात (वैक्यूम) है – वहाँ न तो ऑक्सीजन के अणु हैं और न ही एक बूंद पानी या हवा में घुली नमी। यानी जंग लगने के लिए ज़रूरी दोनों मुख्य तत्व ही गायब हैं, इसलिए रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू होने का सवाल ही नहीं उठता।
लेकिन सिर्फ ऑक्सीजन और नमी का अभाव ही एकमात्र कारण नहीं है। अंतरिक्ष यात्री और इंजीनियर शुरू से ही इस बात का ख्याल रखते हैं कि सैटेलाइट में जंग लगने वाली धातुओं का इस्तेमाल न्यूनतम हो। अधिकांश सैटेलाइट एल्यूमिनियम और उसके मिश्र धातुओं से बनाए जाते हैं, जो हवा के संपर्क में आने पर अपने आप एक पतली ऑक्साइड परत बना लेते हैं और आगे ऑक्सीकरण रुक जाता है। टाइटेनियम का भी बड़े पैमाने पर उपयोग होता है, जो न सिर्फ बेहद मजबूत है बल्कि जंग के प्रति लगभग पूरी तरह प्रतिरोधी भी।
इसके ऊपर सैटेलाइट को कई खास कोटिंग्स से लैस किया जाता है। सोने की अति पतली परत, निकल कोटिंग, सिरेमिक शील्ड और रेडिएशन-रोधी विशेष पेंट – ये सभी परतें न सिर्फ जंग से बचाती हैं बल्कि अंतरिक्ष की घातक सौर विकिरण और तापमान के उतार-चढ़ाव से भी सुरक्षा प्रदान करती हैं। हर सैटेलाइट को पूरी तरह सील-बंद प्रणाली के रूप में डिज़ाइन किया जाता है, ताकि इसके अंदर का कोई भी हिस्सा बाहरी वातावरण के संपर्क में न आए। एक मिलीमीटर की लीक भी पूरे मिशन को तबाह कर सकती है, इसलिए सीलिंग की प्रक्रिया अत्यंत परिशुद्धता से की जाती है।
हालांकि जंग का खतरा न के बराबर है, लेकिन अंतरिक्ष में सैटेलाइट के लिए सबसे बड़ा दुश्मन सूक्ष्म उल्कापिंड (माइक्रोमीटियोरॉइड्स) और अंतरिक्ष कचरा हैं, जो रेत के कण जितने छोटे होने पर भी प्रकाश की गति से टकराते हैं और भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इस तरह, अंतरिक्ष में जंग का न लगना प्रकृति के नियमों और मानवीय इंजीनियरिंग की संयुक्त जीत है। यही कारण है कि 1957 में लॉन्च हुआ पहला सैटेलाइट स्पूतनिक-1 का मलबा और 1960-70 के दशक के हजारों सैटेलाइट आज भी पृथ्वी की कक्षा में चमचमाता हुआ घूम रहा है। यह विज्ञान का वह चमत्कार है जो हमें याद दिलाता है कि सही समझ और तकनीक से हम प्रकृति के सबसे कठोर नियमों को भी अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
