Water worlds exoplanets : दशकों से मानव जाति इस मुगालते में जी रही थी कि नीले महासागरों और जीवन को धड़कन देने वाले वायुमंडल से समृद्ध हमारी पृथ्वी इस अनंत ब्रह्मांड में इकलौती और अनोखी है। लेकिन आधुनिक अंतरिक्ष अनुसंधान और अत्याधुनिक दूरबीनों ने विज्ञान जगत के इस पुराने भ्रम को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया है। सुदूर अंतरिक्ष की गहराइयों में खगोलविदों ने दो ऐसे रहस्यमयी ग्रहों की खोज की है, जो पूरी तरह से अथाह वैश्विक महासागरों से घिरे हुए हैं। 'TOI-1452 b' और 'K2-18b' नामक इन दोनों ग्रहों के मिलते ही वैज्ञानिक समुदाय में एक नई बहस छिड़ गई है कि क्या पानी की मौजूदगी वाले ये 'वॉटर वर्ल्ड्स' भविष्य में इंसानी बस्तियों का नया ठिकाना बन सकते हैं? हालांकि, इस खोज के साथ ही जो खौफनाक और चौंकाने वाले सच सामने आए हैं, उन्होंने यह साफ कर दिया है कि इन ग्रहों पर इंसानी जीवन का सपना सिर्फ एक जानलेवा मृगतृष्णा है।

महासागरों की अनंत गहराई: जहां कदम रखने को सूखी जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के गहन विश्लेषण के अनुसार, इन सुदूर जल ग्रहों की सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती इनकी भौगोलिक संरचना है। हमारी पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका है, लेकिन इसके बावजूद हमारे पास रहने के लिए महाद्वीप, विशाल पहाड़ और द्वीप मौजूद हैं, जहां इंसान शहरों और आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण कर सका है। इसके विपरीत, TOI-1452 b और K2-18b जैसे ग्रहों पर सूखी जमीन का कोई वजूद ही नहीं है। इन अनोखे ग्रहों पर महासागर किसी उथले समंदर की तरह नहीं, बल्कि सैकड़ों किलोमीटर की भयावह गहराई तक फैले हुए हैं। बिना किसी ठोस धरातल या जमीन के, वहां इंसानी घर, वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र, कृषि फार्म या परिवहन प्रणाली विकसित करना पूरी तरह से नामुमकिन और अकल्पनीय है।

पृथ्वी के पानी से बिल्कुल जुदा : चट्टान जैसी बर्फ और 'सुपर क्रिटिकल फ्लूइड' का मायाजाल

भले ही इन सुदूर ग्रहों पर पानी की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है, लेकिन वहां की रासायनिक और भौतिक परिस्थितियां पृथ्वी के जीवनदायी जल से कोसों दूर हैं। इन महासागरों की अत्यधिक गहराई में जाने पर गुरुत्वाकर्षण और पानी का दबाव इस कदर बढ़ जाता है कि साधारण पानी वहां एक बेहद अजीब और घातक क्रिस्टलीय रूप धारण कर लेता है। विज्ञान की भाषा में इसे कुछ विशिष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

  • आइस VII और आइस X (Ice VII & Ice X): अत्यधिक वायुमंडलीय दबाव के कारण बना पानी का यह रूप हमारे रेफ्रिजरेटर या ग्लेशियरों में मिलने वाली सामान्य बर्फ जैसा ठंडा नहीं होता, बल्कि यह अत्यधिक घनी और तपती हुई चट्टान की तरह व्यवहार करता है।
  • सुपर क्रिटिकल फ्लूइड (Super Critical Fluid): इन ग्रहों के कुछ हिस्सों में अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण पानी अपने सामान्य तरल रूप में रह ही नहीं पाता। वह एक ऐसी रहस्यमयी अवस्था में आ जाता है जो आधा गैस और आधा तरल की तरह व्यवहार करती है, जिसमें इंसानी शरीर का बच पाना असंभव है।

जानलेवा वायुमंडल और लाखों सालों की दूरी : क्यों नामुमकिन है इंसानी सफर ?

ठोस जमीन की अनुपस्थिति और पानी के इस जानलेवा रूप के अलावा, इन ग्रहों को घेरे हुए वायुमंडल में साक्षात मौत का साया है। K2-18b जैसे विशाल जल ग्रह का वायुमंडल बेहद घना और जहरीला है, जिसमें मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम जैसी गैसों का आधिपत्य है। बिना किसी अति-आधुनिक और अभेद्य सुरक्षा कवच के इंसान इस हवा में एक पल भी सांस नहीं ले सकता।

अगर भविष्य में मानव जाति इन सभी विपरीत परिस्थितियों और जानलेवा दबाव से निपटने की कोई तकनीक विकसित कर भी लेती है, तो भी ब्रह्मांड की अनंत दूरी इस सफर के आड़े आ जाएगी। उदाहरण के तौर पर, TOI-1452 b ग्रह हमारी पृथ्वी से लगभग 100 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। यदि एक प्रकाश वर्ष की दूरी लगभग 9.46 ट्रिलियन किलोमीटर होती है, तो वर्तमान की सबसे तेज स्पेसक्राफ्ट टेक्नोलॉजी के सहारे भी वहां तक पहुँचने में इंसानों को कुछ साल या दशक नहीं, बल्कि शायद लाखों साल का समय लग जाएगा। यह दूरी ही इंसानी महत्वाकांक्षाओं के सामने सबसे बड़ा आधिकारिक अवरोध बनकर खड़ी है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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