अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने साल 2032 तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक स्थायी आवास और परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए बहु-चरणीय परियोजना शुरू की है।

NASA Artemis Moon Base Plan 2026 : अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय लिखने की दिशा में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने अब तक का सबसे आक्रामक और बड़ा कदम उठा दिया है। हाल ही में संपन्न हुए आर्टेमिस II मिशन की रिकॉर्ड तोड़ चंद्र परिक्रमा के दो महीने के भीतर ही नासा ने चंद्रमा की सतह पर एक विशाल और स्थायी 'इंसानी बेस' स्थापित करने के लिए लैंडर, रोवर और अत्याधुनिक ड्रोन का ऑर्डर देना शुरू कर दिया है। मंगलवार (26 मई, 2026) को नासा ने अपनी दूरदर्शी और बहु-चरणीय मून बेस योजनाओं के पहले आधिकारिक चरण की रूपरेखा दुनिया के सामने प्रस्तुत की। इसके साथ ही अमेरिकी धरती की चार शीर्ष निजी अंतरिक्ष कंपनियों को करोड़ों डॉलर के भारी-भरकम अनुबंध सौंपकर अंतरिक्ष की इस नई महा-दौड़ में चीन से आगे निकलने की अपनी रणनीतिक मंशा साफ कर दी है।

नासा द्वारा जारी आधिकारिक विवरण के अनुसार, इस महा-परियोजना के शुरुआती चरण में चंद्रमा के बेहद दुर्गम और चुनौतीपूर्ण भूभाग का विस्तृत मानचित्रण करने के लिए रोबोटिक लैंडर्स और हॉपिंग ड्रोन भेजे जाएंगे। इस महत्वाकांक्षी योजना में अमेज़न के संस्थापक जेफ बेजोस की अंतरिक्ष कंपनी 'ब्लू ओरिजिन' सबसे बड़ी भूमिकाओं में से एक निभा रही है। ब्लू ओरिजिन चंद्रमा के अज्ञात रहस्यों से भरे दक्षिणी ध्रुव पर अत्याधुनिक 'मून बग्गी' उतारने के लिए दो शक्तिशाली लैंडर उपलब्ध कराएगी। इन विशिष्ट चंद्र वाहनों का निर्माण अंतरिक्ष क्षेत्र की अग्रणी कंपनियां एस्ट्रोलैब और लूनर आउटपोस्ट मिलकर करेंगी। वहीं, पिछले वर्ष चंद्रमा पर सफल लैंडिंग का परचम लहराने वाली फायरफ्लाई एयरोस्पेस को चंद्रमा की सतह पर दुनिया के पहले उड़ने वाले ड्रोन पहुंचाने की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। नासा का लक्ष्य है कि ये सभी अत्याधुनिक रोबोटिक उपकरण साल 2028 की शुरुआत तक हर हाल में चंद्रमा पर पहुंच जाएं, ताकि उसके बाद वहां उतरने वाले आर्टेमिस अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जमीन पूरी तरह तैयार हो सके।

नासा के इस इग्निशन मून बेस कार्यक्रम को तीन दूरगामी चरणों में विभाजित किया गया है। पहले चरण में रोबोटिक अन्वेषण का यह सिलसिला साल 2029 तक अनवरत चलेगा, जिसके तहत कुल 25 अंतरिक्ष प्रक्षेपण किए जाएंगे और चंद्रमा की धरती पर लगभग 4 मीट्रिक टन का भारी-भरकम साजो-सामान उतारा जाएगा। नासा ने इसके लिए ब्लू ओरिजिन के विशेष चंद्र लैंडर 'एंड्योरेंस' को चुना है जो स्वायत्त नेविगेशन के जरिए बेहद सटीक लैंडिंग करने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त एस्ट्रोबोटिक्स का ग्रिफिन-1 लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित नोबिल क्रेटर पर उतरेगा। ये मशीनें अपने साथ उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले कैमरे और परावर्तित लेजर प्रकाश तकनीक से लैस वैज्ञानिक उपकरण ले जाएंगी। दूसरे और तीसरे चरण के तहत नासा की योजना साल 2032 तक चंद्रमा पर विखंडन रिएक्टरों सहित परमाणु और सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की है। इसका अंतिम उद्देश्य यह है कि साल 2032 तक मानव चंद्रमा पर बने एक "अर्ध-स्थायी" आवास में रहने और रोवर की मदद से पथरीली सतह पर लंबी दूरी की यात्राएं करने में पूरी तरह सक्षम हो जाए।

इस विशाल परियोजना के आधिकारिक और भू-राजनीतिक निहितार्थ भी बेहद संवेदनशील हैं। मार्च में नासा ने इस स्थायी बेस के निर्माण के लिए 20 अरब डॉलर के भारी-भरकम बजट कार्यक्रम की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद नासा के प्रशासक जेरेड इसाकमैन ने मंगलवार को अत्यंत दृढ़ता के साथ कहा कि अमेरिका अब "चंद्रमा को फिर कभी नहीं छोड़ेगा"। वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस समय भारी दबाव है क्योंकि अमेरिका चाहता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साल 2029 में मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति से पहले अमेरिकी नागरिक एक बार फिर चांद पर कदम रख दें। लेकिन इस राह में ड्रैगन सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है, जो साल 2030 तक चांद पर इंसानी पैर जमाने की अपनी योजनाओं पर बेहद आक्रामक ढंग से काम कर रहा है। चीन ने हाल ही में अपने शेनझोउ-23 अंतरिक्ष यान के जरिए अंतरिक्ष यात्रियों के एक नए दल को तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजकर अपनी तैयारियों का लोहा मनवाया है।

हालांकि, नासा की इस अत्यंत महत्वाकांक्षी समयसीमा को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में गहरे मतभेद और संशय की स्थिति बनी हुई है। ओपन यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध चंद्र वैज्ञानिक डॉ. सिमियन बार्बर सहित कई विशेषज्ञों का मानना है कि नासा की समयसीमा पूरी तरह अवास्तविक है। वैज्ञानिकों का तर्क है कि एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स को 'स्टारशिप ह्यूमन लैंडिंग सिस्टम' नामक जिस अंतरिक्ष यान को बनाने का ठेका मिला है, वह लगातार तकनीकी झटकों और देरी का सामना कर रहा है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कुछ वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि नासा के भारी राजनीतिक दबाव के कारण चीन ही चंद्रमा की सतह पर इंसानों को दोबारा उतारने वाला अगला देश बन सकता है। बहरहाल, चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव अपने भीतर छिपे जमे हुए पानी के विशाल भंडारों के कारण दोनों महाशक्तियों के लिए एक बड़ा रणनीतिक और वैज्ञानिक केंद्र बन चुका है। चांद पर बनने वाला यह पहला बेस न केवल भविष्य में मंगल ग्रह की ऐतिहासिक यात्राओं के लिए लॉन्चिंग पैड का काम करेगा, बल्कि ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में मानव जाति की अब तक की सबसे बड़ी छलांग साबित होगा।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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