सिरोही। प्रकृति के कण-कण में जब नव-यौवन का संचार होता है और ऋतुराज बसंत के आगमन से धरा का श्रृंगार होता है, ठीक उसी पावन बेला पर सिरोही स्थित माधव विश्वविद्यालय के प्रांगण में विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती का वंदन किया गया। विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) इकाई के तत्वावधान में आयोजित 'सरस्वती पूजन एवं बसंत उत्सव' ने न केवल परिसर को केसरिया आभा से सराबोर किया, बल्कि प्रेरणादायक व्याख्यानों के माध्यम से विद्यार्थियों के मानस पटल पर ज्ञान और संस्कारों की अमिट छाप छोड़ी। कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ माँ शारदे के चरणों में पुष्प अर्पित कर और पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक और ऊर्जावान हो उठा।

इस गरिमामयी आयोजन को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के प्रेसिडेंट डॉ. राजीव माथुर ने उपस्थित जनसमूह को बसंत पंचमी की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अपने उद्बोधन में इस उत्सव को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, अपार ऊर्जा और नवचेतना का संगम बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि बसंत का यह उत्सव हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए रजिस्ट्रार डॉ. भावेश कुमावत ने विद्यार्थियों को जीवन के व्यावहारिक सूत्रों से जोड़ते हुए कहा कि बसंत उत्सव असल में कर्म, स्पष्ट लक्ष्य और कड़े अनुशासन का प्रतीक है। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे शिक्षा के साथ-साथ चारित्रिक विकास पर भी ध्यान दें।

ज्ञान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए एनएसएस निदेशक डॉ. देवेंद्र मुजाल्दा ने माँ सरस्वती के स्वरूप की व्याख्या की, जबकि शिक्षा विभाग के अधिष्ठाता डॉ. जितेंद्र तिवारी ने हिंदू संस्कृति में इस उत्सव की गहरी जड़ों और विद्या के सांस्कृतिक महत्व को विस्तार से समझाया। साहित्य और शास्त्र का संगम तब देखने को मिला जब डॉ. अखिलेश कुमार सिंह ने महाकवि कालिदास के कालजयी उदाहरणों के माध्यम से माँ सरस्वती की महिमा का वर्णन कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। अभियांत्रिकी विभाग के अधिष्ठाता डॉ. राजेंद्र कुमार वैरागी ने अपने विचार रखते हुए स्पष्ट किया कि इस नश्वर संसार में विद्या से बढ़कर कोई धन नहीं है, क्योंकि इसे न तो कोई चुरा सकता है और न ही यह बांटने से कम होता है।

कृषि विभाग के अधिष्ठाता डॉ. गीतम सिंह ने समाज में 'विद्यादान' को सर्वश्रेष्ठ दान की संज्ञा दी, वहीं डॉ. अमित कुमार सिंह ने बताया कि माँ सरस्वती की वंदना ही एक सार्थक और श्रेष्ठ जीवन का वास्तविक आधार है। बौद्धिक विमर्श को नई ऊंचाई देते हुए आइक्यूएसी निदेशक डॉ. रुचि ठक्कर ने विद्या की तुलना पौराणिक 'कामधेनु' से की, जो मानव जीवन को न केवल समृद्ध करती है बल्कि उसे संस्कारों से भी सुसज्जित करती है।

समारोह के सफल क्रियान्वयन में विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर डॉ. आदेशपाल सिंह, प्लेसमेंट अधिकारी डॉ. अतुल मिश्रा, डॉ. जिगर सोनी, डॉ. अमित भास्कर, डॉ. नेहा, डॉ. रोहिताश और डॉ. संदीप गहलोत सहित एनएसएस स्वयंसेवकों की सक्रिय सहभागिता रही। कार्यक्रम के अंतिम चरण में एनएसएस प्रभारी संगीता सिंह ने सभी आगंतुकों, वक्ताओं और विद्यार्थियों का आभार प्रकट किया। यह उत्सव केवल एक कार्यक्रम मात्र नहीं रहा, बल्कि इसने विद्यार्थियों के भीतर विद्या के प्रति समर्पण और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की एक नई अलख जगा दी।

Pratahkal Newsroom

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