सिरोही/सरूपगंज। सिरोही जिले के सरूपगंज स्थित काशी विश्वनाथ गौ शाला परिसर इन दिनों आध्यात्मिकता और भक्ति के चरम पर है। यहां आयोजित भव्य रामकथा के आठवें दिन गुरुवार को श्रद्धा का ऐसा सैलाब उमड़ा कि संपूर्ण परिसर 'जय श्री राम' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। कथा के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर व्यास पीठ से महंत लालदास महाराज ने रामायण के उन मर्मस्पर्शी प्रसंगों को जीवंत कर दिया, जिन्होंने न केवल दर्शकों की आंखों को नम किया, बल्कि भारतीय संस्कृति के आदर्शों को भी पुनः स्थापित किया।

कथा के केंद्र में भरत और राम का वह दिव्य संवाद रहा, जो त्याग और निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा है। महाराज ने भरत के महान चरित्र का चित्रण करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने राजपाट का मोह त्यागकर अपने बड़े भाई के प्रति निष्ठा प्रकट की और अयोध्या का राज्य लौटाने के लिए कठोर तपस्या का मार्ग चुना। यह प्रसंग आज के समाज के लिए पारिवारिक एकता और नैतिक मूल्यों की एक महान सीख पेश करता है। इसके पश्चात कथा का प्रवाह सीता हरण के उस मोड़ पर पहुँचा, जहाँ मारीच द्वारा स्वर्ण मृग का रूप धारण करने और सीता माता के मोह के कारण घटित हुई घटनाओं ने श्रोताओं को स्तब्ध कर दिया।

रामकथा का सबसे भावुक क्षण मां शबरी का प्रसंग रहा। भगवान राम के प्रति शबरी की अटूट प्रतीक्षा और उनके जूठे बेर खाने की घटना का वर्णन करते हुए महंत लालदास महाराज ने प्रेम और भक्ति की ऐसी व्याख्या की कि उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो गया। कथा में बताया गया कि किस प्रकार प्रभु ने अपने वनवास काल के दौरान साधारण ग्रामीणों और भक्तों को दर्शन देकर उनके जीवन को धन्य किया। जितेंद्रसिंह राठौड़ के कुशल मंच संचालन ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया।

इस भक्तिमय आयोजन की सफलता में महंत संकादिक चरण महाराज, महंत रामचरण महाराज सहित आयोजन समिति के प्रमुख सदस्यों का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम के संयोजक लक्ष्मणसिंह गुजराल, सह संयोजक अरविंद मित्तल और अध्यक्ष प्रवीणसिंह के नेतृत्व में व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया गया। इस धार्मिक अनुष्ठान में माधुराम रावल, भगवानदास सिंधी, मुकेश अग्रवाल, बाबूलाल कलबी, गोपाल प्रजापत, संजय प्रजापत, धनदास वैष्णव, रूपचंद अग्रवाल, मांगीलाल कलबी, नरपतसिंह, सुरेन्द्र सोनी, सुमित अग्रवाल सहित राम सेवा समिति के समर्पित कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु उपस्थित रहे। शुक्रवार को इस भव्य कथा का समापन होगा, जिसमें प्रातः काल यज्ञ के पश्चात कथा वाचन होगा और संध्या के समय महाआरती एवं महाप्रसादी के साथ इस आध्यात्मिक पर्व को विराम दिया जाएगा।

Pratahkal Newsroom

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