माउंट आबू: 994वें वार्षिक ध्वजारोहण महोत्सव के साथ दिलवाड़ा जैन मंदिर में भक्ति का महासंगम
माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर में 994वें वार्षिक ध्वजारोहण महोत्सव का भव्य शुभारंभ। विश्वभर से उमड़े लाखों श्रद्धालु, संतों के प्रवचनों से गूंजी अरावली की वादियां। क्या है इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उत्सव की खास बातें, जानें विस्तार से।

माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर में 994वें वार्षिक ध्वजारोहण महोत्सव के दौरान मंत्रोच्चार करते श्रद्धालु और उपस्थित जैन संत।
माउंट आबू की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित विश्व प्रसिद्ध दिलवाड़ा जैन मंदिर अपनी स्थापत्य कला और आध्यात्मिकता के लिए संपूर्ण विश्व में विख्यात है। इसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गरिमा को संजोए हुए, मंदिर परिसर में तीन दिवसीय 994वें वार्षिक उत्सव एवं भव्य ध्वजारोहण महोत्सव का शुभारंभ हुआ। सुबह की पहली किरण के साथ ही मंदिर परिसर श्रद्धालुओं की उपस्थिति से जीवंत हो उठा और पूरा वातावरण ‘नमो अरिहंताणं’ के मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो गया। इस अद्वितीय ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए देश-विदेश से जैन धर्मावलंबियों का सैलाब उमड़ पड़ा है।
महोत्सव के प्रथम दिन से ही मंदिर परिसर में जनसमूह का उत्साह देखते ही बनता है। इस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और दुबई सहित विश्व के विभिन्न कोनों से आए श्रद्धालु माउंट आबू पहुँचे हैं। अनुमान के अनुसार, इस तीन दिवसीय उत्सव में एक लाख से अधिक श्रद्धालु अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। यह भव्य आयोजन जैन धर्म के प्रख्यात संतों के पावन सानिध्य में संपन्न हो रहा है। आचार्य हैमबल्लभ जी महाराज, महेंद्र सागर जी महाराज और मनीष सागर जी महाराज सहित कई जैन संतों की उपस्थिति ने उत्सव की गरिमा को और अधिक बढ़ा दिया है। संतों द्वारा दिए जा रहे अमृतमयी प्रवचनों से माउंट आबू की धर्मधरा पर एक अभूतपूर्व धार्मिक वातावरण का सृजन हुआ है।
दिलवाड़ा मंदिर की संगमरमर पर उकेरी गई सूक्ष्म और बारीक कलाकृतियाँ विश्वभर के पर्यटकों के लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रहती हैं। स्थापत्य कला का ऐसा अद्भुत उदाहरण विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है, जो इस महोत्सव को केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखकर इसे एक सांस्कृतिक महापर्व का स्वरूप प्रदान करता है। स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन समिति द्वारा श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए व्यापक प्रबंध किए गए हैं, ताकि महोत्सव के दौरान शांति और व्यवस्था सुनिश्चित रहे। यह आयोजन न केवल जैन समाज की अटूट आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति और वास्तुकला की वैश्विक पहचान को भी पुनर्परिभाषित कर रहा है। आने वाले दो दिनों में भी मंदिर परिसर में निरंतर धार्मिक अनुष्ठान और संतों के आशीर्वचन का क्रम जारी रहेगा, जो श्रद्धालुओं के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव सिद्ध होगा।

Pratahkal Hub
प्रातःकाल हब, दै.प्रातःकाल की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा प्रातःकाल हब राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।"
