गंगापुर सिटी में गूंजा अखंड भारत का संकल्प: 'हिंदुत्व ही बनेगा विश्व शांति का आधार, जातिभेद मिटाकर एकजुट हो हिंदू समाज'
गंगापुर सिटी के चूली मंडल में आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन में उमड़ा जनसैलाब। प्रांत प्रचारक बाबूलाल और पूज्य संतों ने जातिभेद मिटाकर अखंड भारत के निर्माण और सामाजिक समरसता का आह्वान किया। जानिए कैसे हिंदुत्व बनेगा विश्वबंधुत्व का आधार और क्यों आवश्यक है समाज का संगठन। देश की आजादी के शताब्दी वर्ष तक राष्ट्र को परम वैभवशाली बनाने का लिया गया संकल्प।

गंगापुर सिटी। राजस्थान के गंगापुर सिटी स्थित चूली मंडल में सोमवार को आयोजित 'विराट हिंदू सम्मेलन' ने वैचारिक क्रांति का शंखनाद कर दिया। हजारों की संख्या में उमड़े जनसैलाब और संतों के सानिध्य में गूंजते मंत्रोच्चार के बीच वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि हिंदुत्व केवल एक उपासना पद्धति नहीं, बल्कि वह जीवन दर्शन है जो भविष्य में 'विश्वबंधुत्व' की आधारशिला रखेगा। कार्यक्रम का आरंभ महिलाओं द्वारा निकाली गई भव्य 151 कलशों की यात्रा से हुआ, जिसने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय कर दिया। कलश यात्रा के पांडाल पहुंचने पर शेरसिंह और जगन पद समूह द्वारा प्रस्तुत 'पद दंगल' ने लोक संस्कृति के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया, जिसने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मंच पर संत श्री देवानंद जी महाराज एवं संत श्री वैष्णव दास जी महाराज की गरिमामय उपस्थिति रही। मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक बाबूलाल ने समाज को आइना दिखाते हुए कहा कि आमतौर पर जातियों के सम्मेलन होते रहते हैं, लेकिन चूली मंडल का यह 'सर्व समाज' सम्मेलन एक ऐतिहासिक शुरुआत है। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कहा कि संपूर्ण विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जो अपनी भूमि को 'माँ' कहकर पुकारता है। उन्होंने इतिहास के कड़वे पन्नों को पलटते हुए स्मरण कराया कि 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग किलोमीटर था, जो विभाजनकारी ताकतों और आक्रांताओं के षडयंत्रों के कारण सिमटकर 33 लाख वर्ग किलोमीटर रह गया। उन्होंने चेतावनी दी कि जो देश अखंड आर्यावर्त से अलग हुए, वे आज दुर्दशा का सामना कर रहे हैं क्योंकि उनमें अपनी मातृभूमि के प्रति वह ममत्व और संस्कार शेष नहीं हैं।
प्रांत प्रचारक ने आधुनिक समाज में घर कर गई जातिवाद की कुरीति पर प्रहार करते हुए इसे 'परिस्थितिजन्य बुराई' करार दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति मूलतः कर्म प्रधान और समरस रही है, जहाँ अधिकारों से अधिक कर्तव्यों को प्राथमिकता दी जाती थी। उन्होंने समाज के समक्ष पांच महत्वपूर्ण परिवर्तनों का रोडमैप रखा, जिनमें नागरिक कर्तव्य, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, अपने गौरवशाली अतीत का बोध और कुटुंब प्रबोधन शामिल हैं। उन्होंने आह्वान किया कि जब भारत अपनी आजादी का शताब्दी वर्ष मना रहा हो, तब तक हिंदू समाज इतना संगठित और शक्तिशाली हो कि राष्ट्र पुनः अपने 'परम वैभव' को प्राप्त कर सके।
आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हुए संत देवानंद महाराज ने सामाजिक कुरीतियों के त्याग पर बल दिया। उन्होंने सचेत किया कि हिंदू समाज की समावेशी प्रकृति और दयालुता को कोई हमारी कमजोरी न समझे, इसके लिए संगठन की शक्ति अनिवार्य है। वहीं, संत वैष्णवदास महाराज ने एक मार्मिक उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार जड़ को सींचने से पूरा वृक्ष हरा-भरा रहता है, उसी प्रकार हिंदू समाज को संगठित रखने से ही अखंड भारत की संकल्पना जीवित रहेगी। उन्होंने शास्त्र सम्मत विधि से गौ-माता की सेवा और उनके आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। इस विशाल समागम ने न केवल गंगापुर सिटी में सामाजिक एकता का संदेश दिया, बल्कि आधुनिकता की दौड़ में बिखरते परिवारों और जाति-पाति में बंटते समाज को पुनः अपने पूर्वजों के गौरवशाली मार्ग पर लौटने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम का समापन सामूहिक अल्पाहार के साथ हुआ, जिसने सर्व-समाज के मिलन की भावना को और प्रगाढ़ किया।

Pratahkal Bureau
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