श्रीगंगानगर विधायक पर मारपीट का आरोप, दलित संगठन ने सौंपा ज्ञापन
अधिकारियों

गंगापुर सिटी में एजेएके संगठन के पदाधिकारी उपखंड अधिकारी बृजेंद्र मीणा को श्रीगंगानगर विधायक के विरुद्ध कार्रवाई की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपते हुए।
गंगापुर सिटी। राजस्थान के श्रीगंगानगर में अधिकारियों के साथ हुई कथित बर्बरता और विधायक की कार्यशैली के विरोध में अब दलित संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। डॉ. अंबेडकर अनुसूचित जाति अधिकारी-कर्मचारी एसोसिएशन (एजेएके) के स्थानीय पदाधिकारियों ने इस गंभीर प्रकरण को लेकर उपखंड अधिकारी बृजेंद्र मीणा को एक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें श्रीगंगानगर विधायक पर पद के दुरुपयोग और मारपीट के संगीन आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
मदन मोहन गर्ग द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरे विवाद की जड़ 30 अप्रैल की वह घटना है जब श्रीगंगानगर विधायक द्वारा विधायक सेवा केंद्र पर एक बैठक के बहाने सहायक अभियंता जगनलाल बैरवा, शहनवाज हसन और सोहम परमार को बुलाया गया था। ज्ञापन में सनसनीखेज आरोप लगाया गया है कि सेवा केंद्र पर इन अधिकारियों के साथ न केवल गाली-गलौज की गई और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उन्हें अपमानित किया गया, बल्कि उनके साथ गंभीर मारपीट भी की गई। इस हिंसक घटना में एक पीड़ित अधिकारी की आंख और पैर में गंभीर चोटें आई हैं।
संगठन ने घटना के बाद के घटनाक्रम को और भी संदिग्ध बताते हुए आरोप लगाया कि साक्ष्य मिटाने की नीयत से पीड़ितों के मोबाइल छीन लिए गए और उनके कपड़े बदलवाकर मामले को पूरी तरह दबाने का कुत्सित प्रयास किया गया। एसोसिएशन ने स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी तीखे सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पुलिस ने दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़ितों को ही शांतिभंग के झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, जो न्याय प्रक्रिया का खुला मजाक है।
न्याय की गुहार लगाते हुए एसोसिएशन ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण में एससी-एसटी एक्ट सहित अन्य संबंधित धाराओं के तहत तत्काल मुकदमा दर्ज किया जाए। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई या किसी वरिष्ठ अधिकारी की सीधी निगरानी में कराई जानी चाहिए। साथ ही, घटना के समय मौजूद अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कर उनके विरुद्ध भी सख्त विभागीय कार्रवाई की जाए। एसोसिएशन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने शीघ्र ही निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की, तो संपूर्ण अनुसूचित जाति समाज बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होगा, जिसकी समस्त जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

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