शनि जयंती 2026: 16 मई को दुर्लभ महासौभाग्य योग में होगी शनि उपासना
16 मई को शनिवार के दिन शनि जयंती और वट सावित्री अमावस्या का विशेष संयोग बन रहा है, जो शनि दोष से मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है।

टोंक के मंदिरों में शनि जयंती के अवसर पर शनिदेव की प्रतिमा का सरसों के तेल से अभिषेक करते श्रद्धालु।
बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि न्यायाधिपति शनिदेव की जयंती प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाई जाती है, लेकिन इस वर्ष 16 मई, शनिवार को शनि जयंती विशेष महासंयोग में मनाई जाएगी। इससे पहले वर्ष 2016 में शनिवार के दिन शनि जयंती का संयोग बना था। इस बार दुर्लभ महासौभाग्य योग बनने से शनि उपासना का महत्व और बढ़ गया है।
मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध संस्थान, टोंक के निदेशक बाबूलाल शास्त्री के अनुसार, अमावस्या तिथि सुबह 05:11 बजे से प्रारंभ होकर अर्द्धरात्रि बाद 01:34 बजे तक रहेगी। भरणी नक्षत्र दोपहर बाद 05:30 बजे तक रहेगा, इसके बाद कृतिका नक्षत्र का प्रवेश होगा। मेष राशि का चंद्रमा रात्रि 10:46 बजे तक रहेगा, तत्पश्चात वृष राशि में प्रवेश करेगा। सुबह 10:25 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा, जिसके बाद शोभन योग का संयोग बनेगा। यह विशेष फलदायी योग माना जा रहा है।
उन्होंने बताया कि सौभाग्य योग का यह दुर्लभ संयोग साढ़ेसाती, ढैया और शनि महादशा से पीड़ित जातकों के लिए विशेष शुभ और सिद्धि मुहूर्त माना जा रहा है। इसी दिन वट अमावस्या का संयोग होने से सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना के साथ वट सावित्री पूजन भी करेंगी।
बाबूलाल शास्त्री ने कहा कि इस दिन श्रद्धालु शनिदेव के मंदिरों में जाकर सरसों का तेल अर्पित करते हैं। हिन्दू धर्म में शनिदेव को न्याय का देवता माना गया है और उन्हें शनिश्चर तथा सांटनिश्चर भी कहा जाता है, जिसका अर्थ ‘सज्जनों का नेता’ बताया गया है। शनिवार को उनकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। शनिदेव को नीले वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनका वाहन काला घोड़ा माना जाता है।
उन्होंने हनुमान जी और शनिदेव से जुड़ी प्राचीन कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि रावण पुत्र मेघनाथ ने युद्ध में शनिदेव को घायल कर दिया था। उस समय हनुमान जी ने उनके शरीर पर सरसों का तेल लगाया, जिससे उन्हें राहत मिली और वे शीघ्र स्वस्थ हुए। तभी से शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करने की परंपरा प्रचलित हुई। शनिदेव का रंग काला होने और सरसों के तेल का रंग गहरा होने के कारण भी इसे विशेष महत्व दिया जाता है।
बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि सरसों के तेल में अनेक औषधीय गुण होते हैं। यह रक्त संचार को बेहतर बनाता है, जोड़ों के दर्द में राहत देता है और त्वचा के लिए लाभकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्तों के कष्ट दूर करते हैं।
उन्होंने बताया कि शनिवार को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद श्रद्धालु दीपक में सरसों का तेल भरकर प्रज्ज्वलित करें और उसे शनिदेव की प्रतिमा के समक्ष रखें। ‘ॐ शनिदेवाय नमः’ मंत्र का जाप करते हुए सरसों का तेल अर्पित करें। साथ ही नीले फूल, काले वस्त्र, काले तिल और उड़द की दाल अर्पित कर आरती एवं मनोकामना प्रार्थना करें।
बाबूलाल शास्त्री के अनुसार, शनिदेव पर शनिवार को तेल चढ़ाने से उनकी प्रतिमा चमकदार रहती है तथा सरसों का तेल जलाने से वातावरण शुद्ध होकर नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। पौराणिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करना महत्वपूर्ण माना गया है। इस वर्ष 16 मई को बन रहा महासौभाग्य योग श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व लेकर आ रहा है।

Pratahkal Bureau
प्रातःकाल ब्यूरो, प्रातःकाल न्यूज़ की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा ब्यूरो राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।
