सवाई माधोपुर शहर में सड़क चौड़ाईकरण और विकास कार्यों के नाम पर बड़े स्तर पर जारी वृक्ष कटाई को लेकर स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश और गहरी चिंता व्याप्त है। पेड़ों को बचाने के लिए लगातार प्रशासन और सरकार से अपील की जा रही है, इसके बावजूद कटाई का कार्य निरंतर जारी है। विशेष रूप से आधी रात के समय पेड़ों की कटाई किए जाने को लेकर लोगों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि रात्रिकालीन वृक्ष कटाई पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत गंभीर विषय है, क्योंकि रात के समय पेड़ों पर पक्षियों, विभिन्न जीव-जंतुओं और उनके बच्चों का प्राकृतिक आवास रहता है। ऐसे समय में पेड़ों की कटाई से जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। साथ ही रात में कटाई और लकड़ी के परिवहन से पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह बताया जा रहा है कि कई ऐसे पेड़ भी काटे जा रहे हैं जो सड़क सीमा में नहीं आ रहे हैं तथा फुटपाथ या उससे दूर स्थित हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ऐसे पेड़ों को भी रात के अंधेरे में एक साथ काटा जा रहा है। नागरिकों ने सवाल उठाया है कि आधी रात को काटी जा रही लकड़ी को कहां ले जाया जा रहा है, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड या सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, जिससे पूरी प्रक्रिया पर संदेह और गहरा गया है।

जानकारी के अनुसार 5 मई से 7 मई की रात्रि तक करीब 25 पेड़ों की कटाई की जा चुकी है। बीती रात पुराने ट्रक यूनियन क्षेत्र में पेड़ कटाई की सूचना मिलने पर वन विभाग की सामाजिक वानिकी शाखा के रेंजर कैलाश शर्मा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। “पेड़ बचाओ आंदोलन” से जुड़े लोगों की सूचना पर वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए मौके से पेड़ काटने में प्रयुक्त मोटर और ट्रैक्टर को जब्त कर सामाजिक वानिकी पौधशाला परिसर में खड़ा कराया। रेंजर कैलाश शर्मा ने बताया कि मामले में भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 41 और 42 के तहत कार्रवाई की जा रही है तथा संबंधित वाहन सीज किए जाएंगे।

पर्यावरण प्रेमियों ने गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा है कि जिस क्षेत्र में वृक्ष कटाई की जा रही है, वह रणथंभौर नेशनल पार्क की वन सीमा से लगभग 10 किलोमीटर की परिधि में आता है। उच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट किया गया है कि जिन क्षेत्रों में इको सेंसिटिव जोन अधिसूचित नहीं किया गया है, वहां वन और राष्ट्रीय उद्यान की सीमा से 10 किलोमीटर की परिधि को इको सेंसिटिव जोन माना जाएगा। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में बड़े स्तर पर वृक्ष कटाई और विकास कार्यों के लिए विशेष पर्यावरणीय सावधानियां तथा वैधानिक स्वीकृतियां आवश्यक मानी जाती हैं।

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इन महत्वपूर्ण पर्यावरणीय नियमों और न्यायालयीय निर्देशों को दरकिनार करते हुए स्थानीय स्तर पर वृक्ष कटाई की अनुमति जारी कर दी गई। आरोप यह भी है कि बड़े स्तर की कटाई को अलग-अलग छोटे टुकड़ों में विभाजित कर, एक ही तिथि और समान परिस्थितियों वाले आवेदनों पर अनुमति प्रदान की गई, जिससे पूरी प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।

मामला वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है। हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान वन विभाग सहित संबंधित पक्षों को जवाब प्रस्तुत करना था, लेकिन जवाब प्रस्तुत नहीं होने की स्थिति में न्यायालय ने अगली सुनवाई की तिथि 3 जून निर्धारित की है। न्यायालय ने प्रशासन से अपेक्षा व्यक्त की है कि वृक्ष कटाई की संपूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः नियमानुसार और वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों की अवहेलना कर की जाने वाली कोई भी कार्रवाई कानून और जनहित के विरुद्ध मानी जाएगी।

लगातार हो रही वृक्ष कटाई को लेकर स्थानीय स्तर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरण प्रेमियों और आम नागरिकों में गहरा दुख और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर भारी निराशा देखी जा रही है। लोगों का कहना है कि विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण और वर्षों पुराने पेड़ों को बचाना भी उतना ही जरूरी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं हैं, बल्कि सीधे लोगों के स्वास्थ्य, स्वच्छ हवा, सांसों और जीवन से जुड़े हुए हैं।

चेतावनी दी जा रही है कि यदि इसी प्रकार अंधाधुंध वृक्ष कटाई जारी रही तो आने वाले समय में सवाई माधोपुर की पर्यावरणीय पहचान, जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों ने मांग की है कि जब तक मामला न्यायालय में लंबित है, तब तक समस्त वृक्ष कटाई पर तत्काल रोक लगाई जाए तथा सभी अनुमतियों, प्रक्रियाओं और रात्रिकालीन कटाई की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।

Pratahkal Bureau

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