सवाई माधोपुर: कांपते उत्तर भारत में 'साइलेंट किलर' बनीं बर्फीली हवाएं, आंकड़ों ने बढ़ाई धड़कनें
सवाई माधोपुर के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. सुमीत गर्ग ने बताया कैसे कड़ाके की ठंड और शीत लहर दिल व फेफड़ों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 5 वर्षों में 3,600 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। जानें हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अस्थमा से बचाव के उपाय और शीत लहर से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों की पूरी जानकारी।

सवाई माधोपुर समेत समूचे उत्तर भारत में छाई घने कोहरे की चादर और हड्डियों को सुन्न कर देने वाली बर्फीली हवाएं केवल जनजीवन को अस्त-व्यस्त ही नहीं कर रहीं, बल्कि ये एक अदृश्य शिकारी की तरह सेहत पर सीधा वार कर रही हैं। जब आप सुबह की पहली किरण के साथ घर से बाहर कदम रखते हैं, तो वह सर्द झोंका सिर्फ आपकी त्वचा को नहीं छूता, बल्कि आपके दिल और फेफड़ों की कार्यप्रणाली को हिलाकर रख देता है। हालिया आंकड़े इस मौसमी आपदा की भयावहता को चीख-चीख कर बयां कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 से 2023 के बीच देश में शीत लहर के कारण 3,600 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। यह आंकड़ा चेतावनी है उस 90 करोड़ की आबादी के लिए, जो भारत के 'कोर कोल्ड वेव ज़ोन' में निवास करती है।
इस जानलेवा ठंड के चिकित्सकीय पहलुओं पर गहरा प्रकाश डालते हुए गर्ग हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, सवाई माधोपुर के निदेशक और वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. सुमीत गर्ग बताते हैं कि ठंड का सबसे क्रूर प्रहार मनुष्य के हृदय पर होता है। जैसे ही शरीर का सामना कड़ाके की ठंड से होता है, हमारा सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम तत्काल सक्रिय हो जाता है। इस जैविक प्रतिक्रिया के कारण रक्त नलिकाएं सिकुड़ने लगती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर में अचानक उछाल आता है। डॉ. सुमीत गर्ग के अनुसार, ठंड के संपर्क में आने के दो से छह दिनों के भीतर हार्ट अटैक और स्ट्रोक की संभावना चरम पर होती है। इस दौरान शरीर में एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स का स्तर बढ़ने से न केवल दिल की धड़कनें अनियंत्रित होती हैं, बल्कि रक्त के थक्के जमने का जोखिम भी कई गुना बढ़ जाता है।
हृदय के साथ-साथ श्वसन तंत्र भी इस मौसम में दोहरी मार झेलता है। ठंडी और शुष्क हवाएं सांस की नलियों में जलन पैदा करती हैं, जो अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और सीओपीडी के मरीजों के लिए किसी बुरे सपने जैसा साबित होता है। सर्दियों की एक बड़ी विडंबना यह भी है कि लोग प्यास कम लगने के कारण पानी का सेवन घटा देते हैं, जिससे म्यूकस सूख जाता है और संक्रमण का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। बंद कमरों में हीटर का अत्यधिक प्रयोग हवा की नमी को सोख लेता है, जिससे फेफड़ों की बीमारियां और भी जटिल हो जाती हैं। डॉ. सुमीत गर्ग विशेष रूप से आगाह करते हैं कि मधुमेह के रोगियों को इस दौरान अधिक सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि कम शारीरिक गतिविधि और मेटाबॉलिक बदलावों के कारण शुगर लेवल अनियंत्रित होने का खतरा बना रहता है।
अक्सर लोग अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जो जानलेवा साबित होती हैं। बिना किसी वार्म-अप के अचानक सुबह की कड़ाके की ठंड में निकलना या भारी शारीरिक श्रम करना सीधे तौर पर दिल को खतरे में डालना है। बचाव के उपायों पर चर्चा करते हुए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि एक मोटे कपड़े के स्थान पर परतों (Layering) में कपड़े पहनना कहीं अधिक प्रभावी है। इनर, शर्ट और जैकेट की परतें शरीर की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती हैं। इसके अतिरिक्त, घर को गर्म रखने के लिए अंगीठी का प्रयोग मौत को बुलावा देने जैसा है, क्योंकि इससे निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस एक मूक हत्यारी है। हीटर का उपयोग करते समय भी वेंटिलेशन का ध्यान रखना अनिवार्य है। अंततः, डॉ. सुमीत गर्ग का निष्कर्ष है कि प्रकृति के इस प्रकोप से पूरी तरह बचना असंभव है, लेकिन सजगता, संतुलित आहार और समय पर चिकित्सीय परामर्श के माध्यम से हम इस 'सर्द युद्ध' को सुरक्षित रूप से जीत सकते हैं।

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