सवाई माधोपुर। राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में मरुधरा की शीत लहर और दिन-रात के तापमान में आ रहे उतार-चढ़ाव ने अब बेजुबान पशुओं की सेहत पर संकट गहराना शुरू कर दिया है। वर्तमान परिस्थितियों में गिरते पारे के कारण न केवल दुग्ध उत्पादन में गिरावट की आशंका बढ़ गई है, बल्कि पशुओं में घातक बीमारियों के फैलने का खतरा भी कई गुना बढ़ गया है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए पशुपालन विभाग पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहा है। विभाग ने पशुपालकों को आगाह करते हुए इसे केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि पशुधन की सुरक्षा के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय बताया है।

सवाई माधोपुर पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. राजीव गर्ग ने इस संदर्भ में व्यापक दिशा-निर्देश जारी करते हुए बताया कि बदलते मौसम का सबसे पहला प्रहार पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता और उनके उत्पादन पर होता है। उन्होंने विशेष रूप से जोर दिया कि यदि दुग्ध उत्पादन में किसी भी प्रकार की कमी महसूस हो या पशु में बीमारी के प्रारंभिक लक्षण दिखाई दें, तो पशुपालक बिना समय गंवाए निकटतम पशु चिकित्सक से संपर्क स्थापित करें। डॉ. गर्ग ने स्पष्ट किया कि फडकिया, गलघोंटू, पी.पी.आर, भेड़ माता, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाव का एकमात्र प्रभावी रास्ता समय पर टीकाकरण ही है। उन्होंने जिले के समस्त पशुपालकों से अपील की है कि वे अपने पशुधन को इन मिश्रित संक्रमणों से बचाने के लिए अनिवार्य रूप से टीके लगवाएं।

पशुओं के रहन-सहन और आवास व्यवस्था को लेकर भी विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। डॉ. राजीव गर्ग के अनुसार, एनिमल शेड्स को शीत लहर से सुरक्षित बनाने के लिए जूट की टाटपट्टी या तिरपाल का उपयोग किया जाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि छोटे पशुओं और पोल्ट्री को सर्द हवाओं के सीधे प्रकोप से बचाया जा सके। पशुओं के बैठने के स्थान पर सूखी घास की बिछावट करने से उन्हें धरातल की ठंडक से राहत मिलेगी। इसके साथ ही, आवास गृहों में वेंटिलेशन का प्रबंधन इस प्रकार होना चाहिए कि वहां ताजी हवा और प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था रहे, जिससे नमी और सीलन से पैदा होने वाली बीमारियों को रोका जा सके।

पोषण के मोर्चे पर जानकारी साझा करते हुए संयुक्त निदेशक ने कहा कि सर्दियों में पशुओं को गुणवत्तापूर्ण हरा वसा युक्त पौष्टिक और संतुलित आहार उपलब्ध कराना उनके स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, आंतरिक और बाह्य परजीवियों के प्रकोप से बचाने हेतु पशु चिकित्सक की सलाह पर परजीवीनाशक दवाओं का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने एक महत्वपूर्ण चेतावनी देते हुए कहा कि पशुओं को कभी भी घुटन भरे स्थान पर न रखें और विशेष रूप से धुएं से बचाएं, क्योंकि धुएं के कारण पशुओं को सांस लेने में गंभीर तकलीफ हो सकती है। जिले की सभी गौशालाओं को भी इन उपायों को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि जिले की बहुमूल्य पशु संपदा को सुरक्षित रखा जा सके। पशुपालन विभाग की यह सक्रियता न केवल पशुओं के जीवन की रक्षा करेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले पशुपालकों के आर्थिक हितों की भी सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।

Pratahkal Bureau

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