प्रयागराज: यूजीसी के नए रेगुलेशन पर उबाल, अग्र संचार नेट ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र लिख जताई गंभीर चिंता
प्रयागराज में यूजीसी के 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026' के खिलाफ अग्र संचार नेट ने खोला मोर्चा। प्रांतीय अध्यक्ष सोहन लाल गुप्ता और महेश गुप्ता ने पीएम मोदी व राष्ट्रपति को पत्र लिख सवर्ण समाज के हितों की रक्षा की मांग की। जानें क्यों इन नए नियमों को सवर्ण छात्रों और कर्मचारियों के लिए असुरक्षित और भेदभावपूर्ण बताया जा रहा है।

प्रयागराज। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जारी "प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूट रेगुलेशंस 2026" विवादों के घेरे में आ गया है। इस नए नीतिगत बदलाव को लेकर सवर्ण समाज में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। इसी क्रम में अग्र संचार नेट के प्रांतीय अध्यक्ष सोहन लाल गुप्ता ने देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति महोदया द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र प्रेषित कर इन नियमों को 'अनीतिगत' करार दिया है। सोहन लाल गुप्ता ने केंद्र सरकार से मांग की है कि 13 जनवरी 2026 को जारी किए गए इन प्रावधानों में तत्काल प्रभाव से संशोधन किया जाए, क्योंकि वर्तमान स्वरूप में ये नियम सवर्ण समाज के हितों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
अग्र संचार नेट का तर्क है कि यूजीसी द्वारा लाए गए ये नए नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में अध्ययनरत सवर्ण छात्रों और वहां कार्यरत कार्मिकों के भविष्य को असुरक्षित बना देंगे। संस्था के अनुसार, नए प्रावधानों के भीतर ऐसी खामियां हैं जो सवर्ण वर्ग के विरुद्ध झूठी शिकायतों की बाढ़ ला सकती हैं। पत्र में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि यदि अनुसूचित जाति, जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग की ओर से किसी सवर्ण छात्र या कर्मचारी पर मिथ्या आरोप लगाए जाते हैं, तो सवर्ण पक्ष के संरक्षण के लिए इस रेगुलेशन में कोई पर्याप्त सुरक्षा कवच नहीं दिया गया है। यह असंतुलन भविष्य में सवर्ण समाज के युवाओं के करियर और सम्मान के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
मामले की गंभीरता को साझा करते हुए वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेश गुप्ता ने बताया कि इन नियमों के तहत गठित होने वाली कमेटियों का स्वरूप भी भेदभावपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जो जांच समितियां बनाई जाएंगी, उनमें सामान्य वर्ग के प्रतिनिधियों को उचित स्थान नहीं दिया गया है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि यदि कोई व्यक्ति दुर्भावनापूर्ण तरीके से झूठी शिकायत दर्ज कराता है, तो उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। महेश गुप्ता के अनुसार, यह स्थिति न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों के पूर्णतया विपरीत है। आशंका जताई गई है कि शैक्षणिक संस्थानों में सक्रिय राजनीति या आपसी रंजिश के कारण कई छात्र इन लचीले नियमों का दुरुपयोग कर निर्दोष सवर्ण छात्र-छात्राओं को मानसिक और अकादमिक रूप से प्रताड़ित कर सकते हैं।
इस विरोध प्रदर्शन और आधिकारिक पत्राचार ने अब एक बड़ा वैचारिक मोड़ ले लिया है। अग्र संचार नेट की स्पष्ट मांग है कि समानता के नाम पर किसी एक वर्ग के अधिकारों की बलि नहीं दी जानी चाहिए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति भवन इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या संज्ञान लेते हैं। यदि इन नियमों में संशोधन नहीं किया गया, तो आने वाले समय में उच्च शिक्षण संस्थानों में सवर्ण वर्ग के हितों की रक्षा के लिए यह विरोध एक व्यापक आंदोलन का रूप ले सकता है।

Pratahkal Bureau
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