कभी घरों में रखा जाने वाला नीला ड्रम पानी, अनाज और घरेलू सामान रखने की सामान्य वस्तु हुआ करता था। बच्चों के लिए यह बरसात में खेल का साधन था, किसानों के लिए उपयोगी साथी और गृहिणियों की रोजमर्रा की जरूरत। लेकिन बदलते समय में यही नीला ड्रम अब लोगों के मन में भय, असहजता और कई सवालों का कारण बनने लगा है।

यह कहानी किसी ड्रम की नहीं, बल्कि उस समाज की है जहां कुछ भयावह अपराधों के कारण निर्जीव वस्तुएं भी बदनाम होने लगी हैं। जिस ड्रम में कभी जीवन की जरूरतों को सुरक्षित रखा जाता था, आज उसी को लेकर लोग मजाक में कहने लगे हैं—"भाई, नीला ड्रम मत खरीदना… लोग क्या सोचेंगे!"

यह हंसी नहीं, बल्कि वर्तमान समय का एक दर्दनाक कटाक्ष है।

नीला ड्रम आज भी वही है। उसका रंग नहीं बदला, आकार नहीं बदला और उपयोग भी नहीं बदला। बदला है तो इंसान का व्यवहार और सोच। जब रिश्तों में विश्वास की जगह स्वार्थ हावी होने लगे, जब लालच प्रेम पर भारी पड़ जाए और संवेदनाएं महत्वाकांक्षाओं के नीचे दब जाएं, तब अपराध जन्म लेते हैं। ऐसे में दोष किसी वस्तु का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का होता है जो इंसान को अमानवीय बना देती है।

समाज की विडंबना यह है कि कभी लोग पूछते थे—"कितने लीटर का ड्रम है?" लेकिन अब सवाल उठने लगा है—"रंग कौन-सा है?" पहले दुकानदार ड्रम की मजबूती की गारंटी देता था, लेकिन आज स्थिति ऐसी बन गई है कि उसे यह भरोसा भी देना पड़े कि "ड्रम केवल ड्रम है, डर का प्रतीक नहीं।"

एक रंग का भी सफाई देने की स्थिति में आ जाना समाज के बदलते नजरिए को दिखाता है।

सोशल मीडिया के दौर में दुखद घटनाएं भी कई बार कुछ ही घंटों में मीम और मनोरंजन का विषय बन जाती हैं। त्रासदी पर ठहाके लगाए जाते हैं, दर्द पर व्यूज बटोरे जाते हैं और संवेदनाओं को लाइक्स में तौला जाता है। ऐसे समय में यह सोचने की जरूरत है कि कहीं समाज अपराध से ज्यादा उसके तमाशे का आदी तो नहीं होता जा रहा।

यदि किसी वस्तु का नाम सुनकर समाज सहमने लगे, तो यह संकेत है कि समस्या वस्तु में नहीं बल्कि व्यवस्था और मानसिकता में है। डर उस सोच से होना चाहिए जो रिश्तों को सौदे में बदल देती है। डर उस लालच से होना चाहिए जो इंसान की आत्मा को खत्म कर देता है। डर उस चुप्पी से होना चाहिए जो अपराध देखकर भी मौन रहती है।

नीला ड्रम आज टूटते विश्वास, बिखरते रिश्तों और बढ़ते सामाजिक भय का प्रतीक बन गया है। यदि किसी चीज से डरने की जरूरत है तो वह प्लास्टिक का ड्रम नहीं, बल्कि वह मानसिकता है जो किसी भी घर को अपराध का स्थान बना सकती है।

किसी ड्रम का रंग बदल देने से समाज नहीं बदलेगा। बदलाव जरूरत है इंसान के भीतर के अंधेरे को खत्म करने की। जिस दिन रिश्तों में विश्वास लौटेगा, कानून का भय अपराधियों के मन में होगा और संवेदनाएं फिर से जीवित होंगी, उस दिन नीला ड्रम फिर पानी रखने का साधन होगा, डर का प्रतीक नहीं।

ड्रम कभी अपराधी नहीं होता। अपराध हमेशा इंसान करता है। जब इंसान अपनी इंसानियत खो देता है, तब बदनाम रंग नहीं बल्कि पूरा समाज होता है।

Madan Mohan Garg(Gangapur City)

Madan Mohan Garg(Gangapur City)

नाम: मदन मोहन गर्ग

वर्तमान पद: ब्यूरो चीफ (दैनिक प्रातःकाल, गंगापुर सिटी)

कार्यक्षेत्र: गंगापुर सिटी विधानसभा क्षेत्र सहित सवाई माधोपुर और करौली जिला

बीट: प्रशासनिक समाचार, सामाजिक कार्यक्रम, जनसमस्याएं एवं सभी क्षेत्र

परिचय 

मदन मोहन गर्ग राजस्थान के गंगापुर सिटी क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'दैनिक प्रातःकाल' में गंगापुर सिटी के ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं। उनका मुख्य कार्यक्षेत्र गंगापुर सिटी विधानसभा सहित सवाई माधोपुर और करौली जिला है। वह स्थानीय जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों, सरकारी योजनाओं और सामाजिक कार्यक्रमों सहित सभी क्षेत्रों की खबरों को नियमित रूप से कवर करते हैं।

पत्रकारिता का अनुभव

मदन मोहन गर्ग को क्षेत्रीय पत्रकारिता का लंबा अनुभव है। वह साल 2015 से लगातार 'दैनिक प्रातःकाल' समाचार पत्र से जुड़े हुए हैं और क्षेत्र में समाचार संकलन व ब्यूरो संचालन का कार्य संभाल रहे हैं।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

वह उच्च शिक्षित हैं और उनकी शैक्षणिक योग्यता इस प्रकार है:

  • बी.ए. (B.A.) और बी.एड. (B.Ed.)
  • एम.ए. (M.A.) और एम.एड. (M.Ed. - मास्टर ऑफ एजुकेशन)

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