सवाई माधोपुर: मुई बांध के बहाव क्षेत्र में रिसोर्ट को 90A अनुमति पर विवाद
यूआईटी द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में टूरिज्म यूनिट को मंजूरी देने पर मुख्य सचिव से शिकायत, जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट में डूब क्षेत्र का उल्लेख।

राजस्थान के सवाई माधोपुर स्थित मुई बांध के डाउनस्ट्रीम और बाढ़ संभावित संवेदनशील क्षेत्र में नगर विकास न्यास (UIT) द्वारा टूरिज्म यूनिट और रिसोर्ट के लिए दी जा रही 90A की अनुमति ने एक बड़े विवाद और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा किया है। ग्राम मुई की खसरा संख्या 500, 502, 507, 508, 509, 2073, 2079 एवं 2080 की कुल 5.92 हेक्टेयर भूमि पर व्यावसायिक गतिविधियों को हरी झंडी देने की प्रक्रिया को स्थानीय स्तर पर मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा और नियमों का खुला उल्लंघन माना जा रहा है। मुख्य सचिव और जिला कलेक्टर को भेजी गई शिकायत में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि प्रस्तावित भूमि मुई बांध की पाल से मात्र 150 मीटर और बांध की वेस्ट वीयर से केवल 400 मीटर की दूरी पर स्थित है, जो भारी वर्षा के समय सीधे जलमग्न होने वाले क्षेत्र के अंतर्गत आती है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला तथ्य जल संसाधन विभाग की वह रिपोर्ट है, जिसमें स्वयं सहायक अभियन्ता ने 18 जून 2025 को मौका निरीक्षण के बाद स्वीकार किया था कि वेस्ट वीयर से प्रवाहित होने वाले जल के कारण इन खसरों के प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद, कोटा-लालसोट मेगा हाईवे से 1.3 किमी दूर इस जलमग्न क्षेत्र में पर्यटकों के ठहरने हेतु रिसोर्ट निर्माण की अनुमति देना राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियां उड़ाने जैसा है। शिकायतकर्ता ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि बांध से पानी छोड़े जाने की स्थिति में कोई जनहानि होती है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी यूआईटी के उन अधिकारियों की होगी जिन्होंने इस जोखिमपूर्ण क्षेत्र में निर्माण की राह प्रशस्त की है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब राजस्थान सरकार से इस अवैध प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने और उक्त क्षेत्र को 'नो-कंस्ट्रक्शन जोन' या 'इको-सेंसिटिव जोन' घोषित करने की मांग की जा रही है। साथ ही, सिंचाई विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग की संयुक्त टीम से पुनः स्थलीय निरीक्षण करवाकर रिपोर्ट सार्वजनिक करने और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर विभागीय जांच की मांग ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। यह मामला न केवल पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है, बल्कि भविष्य में आने वाली किसी बड़ी आपदा को रोकने के लिए एक अनिवार्य वैधानिक हस्तक्षेप की मांग करता है।

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