‘जी सर’—दो शब्द, जिनमें सम्मान, अनुशासन, संस्कार और कार्यस्थल की मर्यादा समाई होती है। वरिष्ठ के निर्देश का सम्मान करना जिम्मेदारी का हिस्सा है, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब यही दो शब्द व्यक्ति की सोच, राय और निर्णय की जगह लेने लगते हैं। ‘जी सर’ से ‘जी मैं’ तक का यह सफर इसी सवाल को सामने रखता है कि हम जिंदगी अपने तरीके से जी रहे हैं या केवल निर्देशों का पालन कर रहे हैं।

बचपन में माता-पिता अपने पैरों पर खड़े होना सिखाते हैं। शिक्षक अपने विवेक से निर्णय लेने की सीख देते हैं और किताबें सवाल पूछने की प्रेरणा देती हैं। लेकिन नौकरी और सामाजिक जीवन में प्रवेश के साथ जैसे एक अलग पाठ शुरू हो जाता है—“ऊपर से जो आदेश आए, उसके नीचे ‘जी सर’ लिख दो।”

धीरे-धीरे यही शब्द कार्यशैली से निकलकर व्यक्तित्व का हिस्सा बनने लगते हैं। साहब ने कहा बैठो, बैठ गए। कहा चलो, चल पड़े। कहा रुको, रुक गए। कहा आज देर तक काम करना पड़ेगा, मुस्कुराकर बोल दिए—“जी सर।” ऐसे में अगर मन के भीतर से कभी सवाल उठता है—“लेकिन मैं क्या चाहता हूं?”, तो उसे भी यह कहकर दबा दिया जाता है कि अभी साहब से पूछना बाकी है।

समस्या ‘जी सर’ कहने में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब ‘जी सर’ के पीछे ‘जी मैं’ पूरी तरह गायब हो जाता है। वरिष्ठ का सम्मान अच्छी कार्यसंस्कृति की पहचान है और अनुशासन किसी भी व्यवस्था की मजबूती है, लेकिन अनुशासन और अंधानुकरण के बीच अंतर है। स्वस्थ व्यवस्था वही होती है, जहां कर्मचारी निर्देशों का पालन करने के साथ अपनी राय रख सके, सवाल पूछ सके और जरूरत पड़ने पर सम्मानपूर्वक असहमति भी व्यक्त कर सके।

हर आदेश सही हो, यह जरूरी नहीं और हर निर्णय अंतिम हो, यह भी जरूरी नहीं। कई बार एक सही सवाल बड़ी गलती को रोक सकता है और एक ईमानदार सुझाव पूरी व्यवस्था को बेहतर बना सकता है।

विडंबना यह है कि दूसरों की अपेक्षाएं पूरी करते-करते इंसान अपनी इच्छाओं को पहचानना ही भूल जाता है। बचपन में कुछ बनने का सपना था, युवावस्था में कुछ करने की इच्छा थी। फिर नौकरी आई, जिम्मेदारियां आईं और धीरे-धीरे सपनों की जगह समय-सारिणी ने ले ली। सुबह कार्यालय, दिनभर काम, शाम को थकान और रात को अगले दिन की चिंता। साल गुजरते गए। पद बढ़ा, वेतन बढ़ा, अनुभव बढ़ा, लेकिन भीतर बैठा वह इंसान वहीं रह गया, जो कभी अपने लिए कुछ अलग करना चाहता था।

दूसरों की सफलता पर तालियां बजाते हुए अपने अधूरे सपनों को यह कहकर टाल दिया गया—“अभी समय नहीं है।” फिर एक दिन एहसास होता है कि समय तो था, लेकिन उसे दूसरों की स्वीकृति पाने में खर्च कर दिया गया।

उम्र के आखिरी पड़ाव पर जब इंसान पीछे मुड़कर देखता है, तो जिंदगी पूरी कहानी का हिसाब मांगती है। कितना कमाया, कितना बनाया और कितना सम्मान पाया—इन सवालों के साथ एक सवाल सबसे ज्यादा परेशान करता है—“तुमने अपने लिए कितना जिया?”

तब उपलब्धियों की फाइलें सामने होंगी, पुरस्कारों की सूची होगी, पदोन्नति के आदेश होंगे और दूसरों की प्रशंसा भी होगी। लेकिन अगर अपनी इच्छा, अपने सपने और अपनी पहचान कहीं नहीं मिले तो सफलता अधूरी लग सकती है। उस समय मन में यह सवाल उठ सकता है—“काश! कभी किसी आदेश के बीच अपनी इच्छा के लिए भी जगह बनाई होती।”

इसका अर्थ यह नहीं है कि हर निर्देश का विरोध किया जाए या वरिष्ठों की बात मानने से इनकार कर दिया जाए। ऐसा करना अनुशासन नहीं, बल्कि अराजकता होगी। जरूरत केवल इतनी है कि सम्मान के साथ अपनी पहचान भी बची रहे।

जहां निर्देश उचित हो, वहां कहा जा सकता है—“जी सर।” जहां सुझाव देना हो, वहां कहा जा सकता है—“जी सर, मैं एक सुझाव देना चाहता हूं।” जहां गलती दिखाई दे, वहां सम्मानपूर्वक कहा जा सकता है—“सर, शायद इसे दूसरे तरीके से किया जा सकता है।” लेकिन जहां बात अपने जीवन, अपने सपनों और अपने भविष्य की हो, वहां खुद से सवाल करना जरूरी है—“जी… मैं क्या चाहता हूं?”

जिंदगी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसी अधिकारी, संस्था, समाज या व्यवस्था की नहीं, बल्कि हमारी अपनी है। दूसरों के आदेश पर चलकर एक सफल कर्मचारी बना जा सकता है, लेकिन अपनी आवाज के साथ चलकर ही एक संपूर्ण इंसान बना जा सकता है। इसलिए ‘जी सर’ कहते हुए भी अपनी आवाज को जिंदा रखना जरूरी है। सम्मान देना जरूरी है, लेकिन आत्मसम्मान खोना नहीं। अनुशासन रखना जरूरी है, लेकिन विवेक छोड़ना नहीं। दूसरों की सुनना जरूरी है, लेकिन कभी-कभी अपने भीतर की आवाज सुनना भी उतना ही जरूरी है।

क्योंकि जिंदगी की आखिरी नोटशीट पर किसी साहब के हस्ताक्षर नहीं होंगे। वहां सिर्फ हमारा अपना हस्ताक्षर होगा। और शायद उस दिन सबसे बड़ा अफसोस यही होगा—“पूरी जिंदगी ‘जी सर’ कहते रहे… काश! एक बार दिल से ‘जी मैं’ भी कह दिया होता।”

Madan Mohan Garg(Gangapur City)

Madan Mohan Garg(Gangapur City)

नाम: मदन मोहन गर्ग

वर्तमान पद: ब्यूरो चीफ (दैनिक प्रातःकाल, गंगापुर सिटी)

कार्यक्षेत्र: गंगापुर सिटी विधानसभा क्षेत्र सहित सवाई माधोपुर और करौली जिला

बीट: प्रशासनिक समाचार, सामाजिक कार्यक्रम, जनसमस्याएं एवं सभी क्षेत्र

परिचय 

मदन मोहन गर्ग राजस्थान के गंगापुर सिटी क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'दैनिक प्रातःकाल' में गंगापुर सिटी के ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं। उनका मुख्य कार्यक्षेत्र गंगापुर सिटी विधानसभा सहित सवाई माधोपुर और करौली जिला है। वह स्थानीय जनसमस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों, सरकारी योजनाओं और सामाजिक कार्यक्रमों सहित सभी क्षेत्रों की खबरों को नियमित रूप से कवर करते हैं।

पत्रकारिता का अनुभव

मदन मोहन गर्ग को क्षेत्रीय पत्रकारिता का लंबा अनुभव है। वह साल 2015 से लगातार 'दैनिक प्रातःकाल' समाचार पत्र से जुड़े हुए हैं और क्षेत्र में समाचार संकलन व ब्यूरो संचालन का कार्य संभाल रहे हैं।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

वह उच्च शिक्षित हैं और उनकी शैक्षणिक योग्यता इस प्रकार है:

  • बी.ए. (B.A.) और बी.एड. (B.Ed.)
  • एम.ए. (M.A.) और एम.एड. (M.Ed. - मास्टर ऑफ एजुकेशन)

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