जिले में हाई रिस्क गर्भवतियों की पहचान, स्क्रीनिंग और ट्रैकिंग के साथ सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने के लिए चिकित्सा विभाग ने कवायद तेज कर दी है। राज्य स्तर से वीसी के माध्यम से मिले दिशा निर्देशों के बाद चिकित्सा विभाग ने सेक्टर बैठक और वीसी के जरिए एएनएम व चिकित्सा प्रभारियों के साथ समीक्षा कर जिले की प्रत्येक गर्भवती का मातृत्व 100 फीसदी सुरक्षित करने के निर्देश दिए हैं।

हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली गर्भवतियों की पहचान के लिए एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं से जानकारी ली गई। वीसी के दौरान हाई रिस्क गर्भवती की पहचान, ट्रैकिंग, उपचार और सुरक्षित प्रसव को लेकर प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही जुलाई महीने में होने वाली एचआरपी गर्भवतियों के सुरक्षित प्रसव के लिए जिम्मेदारियां भी तय की गईं।

सीएमएचओ डॉ. अनिल कुमार जेमिनी ने बताया कि गर्भवती के पंजीकरण के साथ ही उसके स्वास्थ्य की पूरी मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी तय की गई है। गर्भधारण के बाद एएनएम की निगरानी में विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच और सलाह देना अनिवार्य किया गया है। इसके साथ ही उपचार और प्रसव की जिम्मेदारी भी निर्धारित कर दी गई है। हाई रिस्क गर्भवतियों की डिलीवरी के लिए सीएचसी और जिला अस्पताल स्तर पर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। परिवहन के लिए 104 और 108 एम्बुलेंस का निर्धारण पहले ही किया जाएगा।

सुरक्षित डिलीवरी को लेकर सीएमएचओ ने जिले की एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं के साथ हुई वीसी में प्रत्येक क्षेत्र के एचआरपी केस और सुरक्षित प्रसव को लेकर दिशा निर्देश दिए। इस दौरान क्षेत्र की हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली गर्भवतियों की संख्या और उनके प्लान की जानकारी ली गई। आशा, एएनएम, सीएचओ और सेक्टर चिकित्सा अधिकारी की जिम्मेदारियों के बारे में भी जानकारी दी गई।

हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली गर्भवती को डिलीवरी की तारीख से पहले निर्धारित अस्पताल में सेक्टर प्रभारी द्वारा भर्ती कराने, सत्यापन के साथ वास्तविक स्थिति का आकलन करने और एचआरपी के कारणों को स्पष्ट रूप से तय करने के निर्देश दिए गए। साथ ही गर्भावस्था के 12 सप्ताह के भीतर पंजीकरण कराने और संस्थागत प्रसव के लिए निर्देशित किया गया।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत सभी गर्भवतियों को अस्पताल बुलाकर ब्लड प्रेशर, एचबी, यूरिन, एचआईवी, सिफिलिस और एचबीएसएजी समेत सभी आवश्यक जांच की जाएंगी। आशा द्वारा की गई हीमोग्लोबिन जांच का एक बार एएनएम द्वारा सत्यापन किया जाएगा। प्रत्येक गर्भवती की चार एएनसी जांच सुनिश्चित की जाएंगी।

गर्भवती में खून की कमी मिलने पर आयरन सुक्रोज के इंजेक्शन लगाए जाएंगे। इसके बाद हर 15 दिन में जांच की जाएगी। यदि इसके बाद भी खून की मात्रा नहीं बढ़ती है तो ब्लड ट्रांसफ्यूजन कराया जाएगा। चिकित्सा विभाग ने हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के खतरे को कम करने के लिए सभी एएनएम, आशा और सीएचओ को अभियान में सक्रिय भागीदारी करने के निर्देश दिए हैं।

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Pratahkal Bureau

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