गंगापुर सिटी। शौर्य, साहस और संस्कारों की त्रिवेणी बहाते हुए जिला आर्य वीर दल के तत्वाधान में आयोजित छह दिवसीय 'आर्य वीरांगना प्रशिक्षण शिविर' का बुधवार को अत्यंत गरिमामय और उत्साहपूर्ण वातावरण में समापन हुआ। शहर के इस विशेष आयोजन ने न केवल बालिकाओं को शारीरिक रूप से सुदृढ़ बनाने का संदेश दिया, बल्कि ऋग्वेद के अमर मंत्र 'मनुर्भव' (मनुष्य बनो) को चरितार्थ करते हुए समाज को श्रेष्ठ मानव बनने की नई राह भी दिखाई। दोपहर 2 बजे से प्रारंभ हुए इस समापन समारोह ने अपनी भव्यता और अनुशासन से उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथियों के सम्मान के साथ हुआ। प्रवक्ता आशुतोष आर्य ने जानकारी दी कि आर्य वीर दल के राष्ट्रीय संचालक नंदकिशोर आर्य, राष्ट्रीय संरक्षक पंडित मदन मोहन आर्य, मुख्य अतिथि हेमंत शर्मा, निवर्तमान सभापति शिवरतन अग्रवाल, एस. डी. एम विजेंद्र मीणा और आचार्य सोमदेव का पारंपरिक रूप से दुपट्टा पहनाकर अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर प्रशिक्षण ले रहीं 150 बालिकाओं ने पिछले छह दिनों में अर्जित किए गए अपने कौशल का जीवंत प्रदर्शन किया। रणकौशल का ऐसा मंजर देख वहां मौजूद श्रोताओं ने दांतों तले उंगली दबा ली। बालिकाओं ने सर्वांग सुंदर व्यायाम, सूर्य नमस्कार के साथ-साथ लाठी, भाला और तलवारबाजी का हैरतअंगेज प्रदर्शन किया। लेजियम की ताल और अग्नि चक्र (आग का गोला) से गुजरने जैसे साहसी कारनामों ने दर्शकों में जोश भर दिया, वहीं पिरामिडों की संरचना ने उनकी एकाग्रता और टीम वर्क का परिचय दिया।

समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय संरक्षक पंडित मदन मोहन आर्य ने शिक्षा और संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने भावुक और प्रेरणादायक लहजे में कहा कि बच्चे राष्ट्र की नींव हैं और एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए बचपन में ही संस्कारवान शिक्षा देना अनिवार्य है। उन्होंने पौधों का उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे कोमल डाली को मनचाहे आकार में मोड़ा जा सकता है, वैसे ही बाल्यकाल में दिए गए संस्कार जीवनभर स्थायी रहते हैं। उन्होंने 'मनुर्भव' की व्याख्या करते हुए बताया कि केवल मानव शरीर प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उदारता, करुणा और सदाचार जैसे दिव्य गुणों को अपनाकर पशुता का त्याग करना ही सच्ची मनुष्यता है। इसी क्रम में राष्ट्रीय संचालक नंदकिशोर आर्य ने पुरुषार्थ पर बल देते हुए कहा कि जो मनुष्य क्रोध, लोभ और मोह का त्याग कर शुभ संकल्पों के साथ कठिन परिश्रम करता है, उसी को सफलता की लक्ष्मी प्राप्त होती है। उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती के आर्य समाज के छठे नियम को उद्धृत करते हुए स्पष्ट किया कि समाज का मुख्य उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक कल्याण करना है।

विशिष्ट अतिथि हेमंत शर्मा ने इस आयोजन की प्रासंगिकता पर बात करते हुए कहा कि वर्तमान परिवेश में बालिकाओं के लिए आत्मरक्षा और सामाजिक जागरूकता के ऐसे शिविर अनिवार्य हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रशिक्षण उन्हें केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी समाज की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। इस भव्य आयोजन की सफलता में जिला संचालक गिरीश आर्य, देवेंद्र आर्य, विश्वबंधु आर्य, शुभम आर्य और प्रशिक्षक जीवन लाल आर्यवीर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम के दौरान वीरेंद्र आर्य, सदभाव आर्य, मुकेश मेडी, ओमेंद्र सिंह राजपूत, मदन मोहन बजाज, रेणु आर्य, सीमा आर्य, सुधा आर्य, बबीता आर्य, मीना आर्य, सरिता, हेमलता, मिथलेश आर्य, मंजू गुप्ता, आरती, ऊषा, ममता आर्य और लक्ष्मी आर्य सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक और स्थानीय निवासी साक्षी बने। यह शिविर न केवल कौशल प्रदर्शन का मंच बना, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक सशक्त कदम के रूप में संपन्न हुआ।

Pratahkal Bureau

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