सवाई माधोपुर, 12 नवम्बर।

देश के भविष्य की नींव बच्चों की सुरक्षा और सशक्तिकरण पर टिकी है — इस भावना के साथ बुधवार को राजीव गांधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय के ऑडिटोरियम में आयोजित बाल अधिकार संरक्षण कार्यशाला में विशेषज्ञों और अधिकारियों ने एक स्वर में कहा कि “बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की जानकारी छुपाना भी पीड़ित बच्चों के प्रति अन्याय है।”

कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, नई दिल्ली और जिला प्रशासन सवाई माधोपुर की ओर से किया गया। कार्यशाला में उपस्थित वक्ताओं ने बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए अतिरिक्त जिला कलक्टर संजय शर्मा ने कहा कि शिक्षक, अधिकारी और अभिभावक यदि बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि बालकों की भौतिक, मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ओमप्रकाश ने बताया कि जिले में पुलिस टीमें बच्चों से जुड़े अपराधों पर संवेदनशीलता और सतर्कता से कार्रवाई कर रही हैं।

बाल अधिकार विशेषज्ञ शैलेन्द्र पंड्या, जो राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य भी रहे हैं, ने कहा कि बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने स्कूलों, अभिभावकों और पुलिस की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि बच्चों को साइबर बुलिंग, शारीरिक या मानसिक शोषण जैसी स्थितियों से बचाने के लिए सशक्त और जागरूक बनाना आवश्यक है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की बाल श्रम उन्मूलन प्रकोष्ठ प्रमुख पायल शर्मा ने बाल मजदूरी निषेध एवं नियंत्रण अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम, पॉक्सो अधिनियम और शिक्षा के अधिकार अधिनियम की प्रमुख धाराओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों पर समाज को चुप नहीं रहना चाहिए। उन्होंने शिक्षकों, अभिभावकों और प्रशासनिक अधिकारियों से आग्रह किया कि ऐसे मामलों में भय, शर्म या सामाजिक दबाव के बजाय साहस और संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई करें।

कार्यशाला में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से जुड़े अधिवक्ता शुभांकर चौधरी ने किशोर न्याय अधिनियम और यौन अपराध निवारण अधिनियम के क्रियान्वयन में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि कानूनों की जानकारी के साथ उनका सही अनुपालन ही बच्चों की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।

इस अवसर पर अतिरिक्त जिला शिक्षा अधिकारी संतोष कुमार मीना, किशोर न्याय बोर्ड सदस्य नरेन्द्र श्रृंगी, सहायक निदेशक बाल अधिकारिता विमलेश शर्मा, श्रम विभाग के अधिकारी, विभिन्न विद्यालयों के प्राचार्य तथा पुलिस कर्मी उपस्थित रहे।

कार्यशाला का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि बच्चों की सुरक्षा और सम्मान केवल एक कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है, जिसे पूरा करना हर नागरिक का कर्तव्य है।

Pratahkal Bureau

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