एपिकॉन 2026: बुजुर्गों में बढ़ते पिल बर्डन और पॉलीफार्मेसी पर शोध पत्र पेश
पटना में आयोजित फिजिशियन कॉन्फ्रेंस में डॉ. सुमीत गर्ग ने बुजुर्गों में अत्यधिक दवाओं के दुष्प्रभावों और डी-प्रिस्क्राइबिंग के महत्व पर प्रकाश डाला।

बिहार की राजधानी पटना में आयोजित दुनिया की सबसे बड़ी फिजिशियन कॉन्फ्रेंस 'एपिकॉन 2026' में बुजुर्गों के गिरते स्वास्थ्य और उन पर बढ़ते दवाओं के बोझ (पिल बर्डन) का मुद्दा छाया रहा। इस वैश्विक मंच पर गर्ग हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक एवं वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. सुमीत गर्ग ने अपना महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किया। डॉ. गर्ग का यह शोध इतना प्रभावी रहा कि इसे प्रतिष्ठित मेडिकल टेक्स्टबुक 'मेडिसिन अपडेट' में एक विशेष अध्याय के रूप में शामिल किया गया है।
क्या है 'पिल बर्डन' और क्यों है यह खतरनाक?
अपने व्याख्यान में डॉ. सुमीत गर्ग ने बताया कि 65 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों में एक साथ कई बीमारियों के चलते दवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। चिकित्सा की भाषा में इसे 'पॉलीफार्मेसी' कहा जाता है, जहाँ एक मरीज 5 या उससे अधिक दवाएं लेता है।
- चौंकाने वाला शोध: डॉ. गर्ग ने वैश्विक आंकड़ों के हवाले से बताया कि दुनिया के 60% बुजुर्ग पॉलीफार्मेसी के शिकार हैं। भारत के महानगरों में तो यह स्थिति और भी भयावह है, जहाँ 30% से 70% बुजुर्ग भारी मात्रा में दवाएं ले रहे हैं।
- दुष्प्रभाव: अत्यधिक दवाओं के कारण बुजुर्गों में गिरने, फ्रैक्चर होने, मानसिक भ्रम (Delirium) और गुर्दे की बीमारियों का खतरा 10 गुना बढ़ जाता है।
दवाओं का 'जाल' और प्रिस्क्राइबिंग कास्केड
डॉ. गर्ग ने एक गंभीर समस्या 'प्रिस्क्राइबिंग कास्केड' पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अक्सर एक दवा के साइड इफेक्ट को नई बीमारी समझ लिया जाता है और उसके लिए एक और दवा लिख दी जाती है। इस तरह बुजुर्ग दवाओं के एक अंतहीन चक्र में फंस जाते हैं, जिससे उनका जीवन सुगम होने के बजाय और कठिन हो जाता है।
कैसे बचें इस बोझ से? फिजिशियन और परिवार की भूमिका
डॉ. सुमीत गर्ग ने अपने शोध पत्र में इस समस्या से निकलने का व्यावहारिक समाधान भी पेश किया:
1. फिजिशियन की जिम्मेदारी:
डॉक्टरों को समय-समय पर 'मेडिकेशन रिव्यू' करना चाहिए। डॉ. गर्ग ने 'डी-प्रिस्क्राइबिंग' (अनावश्यक दवाओं को बंद करना) पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि फिजिशियन को Beers Criteria और STOPP/START जैसे टूल्स का उपयोग कर यह जांचना चाहिए कि कौन सी दवा बुजुर्ग के लिए घातक हो सकती है।
2. परिवार और समाज का साथ:
- बुजुर्ग खुद कई बार दवाओं का हिसाब नहीं रख पाते।
- परिवार के सदस्यों को उनके 'मेडिकेशन चार्ट' पर नजर रखनी चाहिए।
- दवाओं को सरल बनाने के लिए 'पिल-बॉक्स' या 'रिमाइंडर ऐप्स' का उपयोग करना चाहिए।
3. मनोवैज्ञानिक सहयोग:
दवाओं का अधिक बोझ बुजुर्गों में 'डिपेंडेंसी' (निर्भरता) का अहसास पैदा करता है, जिससे वे मानसिक रूप से कमजोर महसूस करते हैं। परिवार को उन्हें भावनात्मक संबल देना चाहिए ताकि वे खुद को बीमार न समझें।
गोलियां नहीं, जीवन की गुणवत्ता है जरूरी
डॉ. सुमीत गर्ग ने अपने व्याख्यान का समापन करते हुए कहा,
"हमारा उद्देश्य बुजुर्गों की उम्र बढ़ाना ही नहीं, बल्कि उनके जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। प्रबंधन का अर्थ केवल गोलियां कम करना नहीं, बल्कि सही दवा को सही कारण के लिए देना है।"
पटना में आयोजित इस कॉन्फ्रेंस में डॉ. गर्ग के इस शोध को देश-दुनिया के विशेषज्ञों ने सराहा और इसे भविष्य की 'जेरियाट्रिक केयर' (बुजुर्ग देखभाल) के लिए एक मील का पत्थर बताया।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
