कृषि विभाग के प्रयासों से सवाई माधोपुर में खिला सुनहरा भविष्य, किसानों की किस्मत चमका रहा है गेंदा फूल
सवाई माधोपुर में कृषि विभाग और आत्मा योजना के प्रयासों से फूलों की खेती का रकबा तेजी से बढ़ रहा है। किसान पारंपरिक फसलों की जगह अब गेंदा उगा रहे हैं और प्रति बीघा एक लाख रुपये तक मुनाफा कमा रहे हैं। गेंदा की आसान खेती, बाजार में उच्च मांग और सरकारी प्रोत्साहन ने जिले में नई खुशहाली ला दी है।

सवाई माधोपुर, 1 नवंबर।
राजस्थान का सवाई माधोपुर अब केवल रणथंभौर के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी फूलों की खेती के लिए भी पहचान बना रहा है। जिले के किसानों ने पारंपरिक फसलों से हटकर अब गेंदा फूल की खेती अपनाई है, जिससे न केवल खेतों में रंग और खुश्बू बिखरी है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कृषि विभाग और आत्मा योजना के संयुक्त प्रयासों ने इस परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई है।
सहायक कृषि अधिकारी पिन्टू लाल मीना के मार्गदर्शन में जिले के गंगापुरसिटी उपखण्ड के अमरगढ़ मालियों की चौकी गांव के किसान हेमराज सैनी सहित कई किसानों ने फूलों की खेती से नई राह पकड़ी है। हेमराज बताते हैं कि पहले वे पारंपरिक फसलें उगाते थे, परंतु उनमें मुनाफा सीमित था। आत्मा योजना के अंतर्गत कृषक भ्रमण कार्यक्रम में फूलों की खेती देखने के बाद उन्होंने गेंदा की खेती शुरू की — और परिणाम चौंकाने वाले रहे। आज एक बीघा में वे लगभग एक लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं।
गेंदा एक ऐसी फसल है जो कम समय और कम लागत में तैयार हो जाती है। इसकी मांग धार्मिक एवं सामाजिक अवसरों पर लगातार बनी रहती है, विशेषकर दशहरा, दीपावली और शादियों के मौसम में। सवाई माधोपुर में फूल उत्कृता केंद्र द्वारा किसानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे अधिक से अधिक कृषक इस लाभदायक फसल से जुड़ रहे हैं।
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि गेंदा की दो प्रमुख प्रजातियां — अफ्रीकी गेंदा और फ्रेंच गेंदा — खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं। अफ्रीकी गेंदा आकार में बड़ा होता है, जबकि फ्रेंच गेंदा छोटा लेकिन जल्दी तैयार होने वाला पौधा है। पुसा बसंती, पुसा नारंगी, जॉइंट डबल और क्रेकर जैक जैसी किस्में किसानों के बीच लोकप्रिय हैं। पुसा नारंगी गेंदा की पैदावार प्रति एकड़ 140 क्विंटल तक पहुँचती है।
खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है, जिसमें जल निकासी उत्तम हो और पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच हो। पौधों की रोपाई मौसम के अनुसार की जाती है—वर्षा ऋतु में जून-जुलाई और सर्दी के मौसम में सितंबर-अक्टूबर में। अफ्रीकी किस्म के लिए पौधों की दूरी 45x45 सेंटीमीटर रखी जाती है, जबकि फ्रेंच गेंदा के लिए 35x35 सेंटीमीटर पर्याप्त है। खेत की तैयारी के दौरान गोबर की खाद के साथ सिंगल सुपर फास्फेट और पोटाश मिलाई जाती है। यूरिया की तीन खुराकें क्रमशः रोपण के समय, 30 दिन और 45 दिन बाद दी जाती हैं, जिससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और फूल भरपूर मात्रा में खिलते हैं।
गेंदा की खेती में रोग और कीटों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है, साथ ही यह ‘ट्रैप क्रॉप’ के रूप में अन्य फसलों को भी कीटों से सुरक्षा प्रदान करता है। स्थानीय बाजार में इसकी मांग निरंतर बनी रहती है, जिससे किसानों को विपणन की समस्या नहीं होती। कई किसान अब स्वयं फूल मालाएं बनाकर बेचते हैं, जिससे उनकी आमदनी चार से पाँच गुना तक बढ़ गई है।
कृषि विभाग के अधिकारी बताते हैं कि जिले में फसल विविधीकरण की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। किसानों को फल, फूल, सब्जी, तिलहन, दलहन, औषधीय और सुगंधित फसलों की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इन प्रयासों का परिणाम अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है—सवाई माधोपुर में नई फसलों का रकबा बढ़ रहा है और किसान नवाचार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
पिन्टू लाल मीना कहते हैं, “हम किसानों के खेतों पर जाकर उन्हें समय-समय पर आधुनिक कृषि तकनीकों और नई फसलों की जानकारी देते हैं। गेंदा की खेती इसका उत्कृष्ट उदाहरण है कि यदि किसान नई सोच अपनाए तो कृषि ही उनकी खुशहाली का आधार बन सकती है।”

Pratahkal Bureau
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