सवाई माधोपुर। भारत आज एक ऐसे भीषण स्वास्थ्य संकट के दौर से गुजर रहा है, जो केवल अस्पतालों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को गहराई से प्रभावित कर रहा है। सवाई माधोपुर के वरिष्ठ फिजीशियन, गर्ग हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक एवं वाइस चेयरमैन एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन्स ऑफ़ इंडिया राजस्थान, डॉ. सुमीत गर्ग ने इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि डायबिटीज (मधुमेह) और हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) अब केवल बुजुर्गों की बीमारियाँ नहीं रही हैं, बल्कि ये तेजी से युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही हैं। डॉ. गर्ग के अनुसार बदलती जीवन शैली, बढ़ता डिजिटल प्रभाव और निरंतर घटती शारीरिक सक्रियता ने इस चिकित्सकीय समस्या को अब एक व्यापक सामाजिक संकट का रूप दे दिया है।

आंकड़ों की भयावहता पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत चिंताजनक प्रतीत होती है। वर्तमान में भारत में लगभग 7.7 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से ग्रसित हैं और करीब 2.5 करोड़ लोग प्रीडायबिटिक स्थिति में हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि वे भविष्य में इस गंभीर बीमारी की ओर अग्रसर हैं। सबसे विचलित करने वाला तथ्य यह है कि कुल ग्रसित आबादी में से 50 प्रतिशत से अधिक लोगों को यह ज्ञात ही नहीं होता कि वे डायबिटीज का शिकार हो चुके हैं। हाइपरटेंशन की स्थिति भी कम भयावह नहीं है; देश में किए गए बड़े अध्ययनों में पाया गया है कि लगभग 25 प्रतिशत से अधिक वयस्क आबादी उच्च रक्तचाप से प्रभावित है, और चिंताजनक रूप से यह समस्या अब 18 से 25 वर्ष के युवाओं में भी बहुतायत में देखी जा रही है।

वैश्विक परिदृश्य पर यह संकट और भी गंभीर है। हाल के अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, विश्व में 80 करोड़ यानी 800 मिलियन से अधिक लोग डायबिटीज से प्रभावित हैं और पिछले 30 वर्षों में यह संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। सबसे अधिक चिंता का विषय इन बीमारियों का कम उम्र में दस्तक देना है। वैश्विक आंकड़े प्रमाणित करते हैं कि बच्चों और किशोरों में उच्च रक्तचाप के मामले पिछले दो दशकों में लगभग दोगुने हो गए हैं। आज का युवा वर्ग, जिसे देश का भविष्य माना जाता है, मोबाइल और स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग का आदी हो चुका है। घंटों सोशल मीडिया, गेमिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिताया गया समय उनकी दिनचर्या और स्वास्थ्य दोनों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। शारीरिक गतिविधि में कमी, नींद का अभाव, मानसिक तनाव और जंक फूड का बढ़ता सेवन मिलकर कम उम्र में ही डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। यह एक ऐसा खतरनाक बदलाव है जिसे नजरअंदाज करना भविष्य में भारी पड़ सकता है, क्योंकि जो बीमारियाँ पहले 50-60 वर्ष की उम्र में होती थीं, वे अब 25-30 वर्ष की आयु में ही दिखाई देने लगी हैं।

यद्यपि युवा वर्ग खतरे में है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बुजुर्ग वर्ग पहले से ही इन बीमारियों का सबसे अधिक भार उठा रहा है। उम्र के साथ शरीर की कार्यक्षमता में कमी, अन्य सह-रोग और नियमित दवाओं पर निर्भरता उन्हें अधिक संवेदनशील बनाती है। डॉ. सुमीत गर्ग ने जोर देकर कहा कि परिवार और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों को एक साथ दो पीढ़ियों, युवा और बुजुर्ग, पर समान रूप से ध्यान केंद्रित करना होगा। डायबिटीज और हाइपरटेंशन को “साइलेंट किलर” की संज्ञा इसलिए दी जाती है क्योंकि ये बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को भीतर ही भीतर धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाते हैं। इनके कारण हृदय रोग, स्ट्रोक (लकवा), किडनी फेल्योर और आंखों की रोशनी जाने जैसी गंभीर जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं और जब तक मरीज को इसका आभास होता है, तब तक स्थिति अक्सर नियंत्रण से बाहर हो चुकी होती है।

मोबाइल और डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग इस संकट को और अधिक गहरा बना रहा है। “जितना अधिक स्क्रीन टाइम, उतनी कम शारीरिक गतिविधि” अब एक प्रामाणिक लेकिन खतरनाक समीकरण बन चुका है। इसके साथ ही बढ़ता मानसिक तनाव और प्रतिस्पर्धा का दबाव युवाओं को अस्वस्थ जीवनशैली की ओर धकेल रहा है। इस जटिल स्थिति में केवल व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं; स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में स्वास्थ्य शिक्षा को प्राथमिकता देना अनिवार्य है ताकि कम उम्र से ही स्वस्थ आदतें विकसित हो सकें। डॉ. गर्ग ने सुझाव दिया कि 20-25 वर्ष की आयु से ही नियमित ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर जांच को बढ़ावा देना चाहिए। खेल, योग और शारीरिक गतिविधियों के लिए बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराना समय की परम आवश्यकता है। बुजुर्गों के लिए नियमित जांच, दवाओं की सुलभ उपलब्धता और निरंतर चिकित्सा परामर्श सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

अंततः, परिवार की भूमिका यहां निर्णायक हो जाती है जहां एक ओर युवाओं के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित किया जाए, वहीं दूसरी ओर बुजुर्गों के स्वास्थ्य का समुचित ध्यान रखा जाए। यह समझना अपरिहार्य है कि डायबिटीज और हाइपरटेंशन केवल बीमारियाँ नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज की बदलती जीवनशैली का प्रतिबिंब हैं। यदि आज हमने समय रहते ठोस और सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में यह स्वास्थ्य समस्या एक बड़े राष्ट्रीय संकट का रूप धारण कर सकती है। अब समय आ गया है कि हम केवल इलाज तक सीमित न रहकर रोकथाम को प्राथमिकता दें और एक स्वस्थ, जागरूक तथा संतुलित समाज के निर्माण की दिशा में सामूहिक रूप से कार्य करें।

Pratahkal Newsroom

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