एक उदास सुबह और ढहता भरोसा

आज सुबह हवा सहमी हुई थी, जैसे उसे पता हो कि आज किसी का घर उजड़ेगा। रास्ते किनारे खड़ा वह पेड़ सालों से धूप-बारिश सहता रहा, पर आज मशीनों की कर्कश आवाज उसकी जड़ों तक उतर गई।

अधूरी ममता और कुचलते सपने

  • सबसे ऊंची टहनी पर तिनकों का छोटा-सा घोंसला था—एक मां चिड़िया और उसके तीन नन्हे बच्चे।
  • वे उड़ना नहीं जानते थे, सिर्फ मां और उस पेड़ पर भरोसा था।
  • मां दाना लेने गई ही थी कि लोहे की धार तने से टकराई।

विनाश का क्षण

"पेड़ कराहा… घोंसला डोला… नन्ही चोंचों से निकला— 'मां…'"

पर अगले ही पल पेड़ धरती पर गिर पड़ा। तिनके बिखर गए, तीन अधूरी उड़ानें मिट्टी में सिमट गईं।

खामोश चीख और सन्नाटा

मां लौटी तो वहां सिर्फ धूल और सन्नाटा था। वह चीखती रही, मंडराती रही, पर कोई आवाज नहीं आई।

विकास बनाम संवेदनशीलता

सड़क अब चौड़ी है, गाड़ियां तेज दौड़ती हैं। लोग कहते हैं “विकास हो रहा है।” पर उस सड़क के नीचे दबी है एक मां की गोद, और एक सवाल— क्या विकास इतना निर्दयी होना जरूरी था?

Pratahkal Bureau

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