टोंक। धर्म ग्रंथों और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष बाद आने वाला अधिक मास इस वर्ष 17 मई से 15 जून तक रहेगा। इसे पुरुषोत्तम मास और मलमास भी कहा जाता है। मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध संस्थान टोंक के निदेशक बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस मास में अमावस्या से अमावस्या के मध्य कोई संक्रांति नहीं पड़ती, उसे अधिक मास कहा जाता है। संक्रांति का अर्थ सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश से है।

उन्होंने बताया कि ज्योतिषीय गणना के अनुसार सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे 11 मिनट का तथा चंद्र वर्ष 354 दिन 9 घंटे का माना गया है। दोनों के बीच लगभग 11 दिन का अंतर रहता है। सौर और चंद्र वर्ष की गणना को संतुलित करने के लिए अधिक मास की व्यवस्था की गई। इस वर्ष पुरुषोत्तम मास ज्येष्ठ मास में प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा, 17 मई रविवार को कृतिका नक्षत्र और वृष राशि में प्रारंभ होगा तथा द्वितीय ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या, 15 जून सोमवार को मृगशिरा नक्षत्र और वृष राशि के चंद्रमा में समाप्त होगा।

बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार 13वां महीना आता है, जिसे मलमास कहा जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर में इसका उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन सनातन परंपरा में इसे पुरुषोत्तम मास के रूप में विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।

उन्होंने धर्म ग्रंथों का उल्लेख करते हुए बताया कि मलमास ने क्षीर सागर में भगवान विष्णु से प्रार्थना की थी कि यदि वह इतना ही अशुभ है तो उसका निर्माण क्यों किया गया। क्योंकि प्रत्येक नक्षत्र, दिन और ग्रह का कोई न कोई स्वामी है, जबकि इस मास का कोई स्वामी नहीं था और इसी कारण इसमें शुभ कार्य नहीं किए जाते थे। तब भगवान विष्णु ने वरदान देते हुए कहा कि आज से यह मास उनके नाम “पुरुषोत्तम” से जाना जाएगा तथा इस मास में उनकी भक्ति करने वालों को असंख्य पुण्य और भवसागर से मुक्ति प्राप्त होगी।

बाबूलाल शास्त्री के अनुसार पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा और विश्वास के साथ उपवास, पूजा-पाठ और दान करने से पुण्य की प्राप्ति तथा कष्टों से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार मास प्रारंभ होने पर भगवान विष्णु की आराधना लाल चंदन, लाल पुष्प और अक्षत से करनी चाहिए। भगवान को घी, गुड़ और गेहूं के आटे से बने मीठे पूवे का भोग कांस्य पात्र में फल, पुष्प, वस्त्र और दक्षिणा सहित अर्पित कर दान करना शुभ माना गया है।

उन्होंने बताया कि धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में नामकरण, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार, मुंडन, विवाह, नववधू प्रवेश, वाहन खरीद और नींव पूजन जैसे शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। वहीं वार्षिक श्राद्ध, मृत्यु तुल्य कष्ट से मुक्ति के लिए रुद्राभिषेक, गर्भाधान संस्कार, दान, जप, पुंसवन संस्कार और सीमन्तोन्नयन संस्कार किए जा सकते हैं। इस मास में भूमि पर शयन और सात्विक भोजन का विशेष महत्व बताया गया है।

बाबूलाल शास्त्री ने भागवत पुराण के छठे स्कंध का उल्लेख करते हुए बताया कि हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि वह किसी महीने, ऊपर-नीचे, बाहर-अंदर कहीं भी मृत्यु को प्राप्त न हो। इसी हिरण्यकश्यपु के वध और भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर अधिक मास में अधर्म का अंत किया था।

उन्होंने वायु पुराण का उल्लेख करते हुए बताया कि मगध सम्राट बसु ने बिहार के राजगीर में वाजपेयी यज्ञ कराया था, जिसमें ब्रह्मा सहित सभी देवी-देवता उपस्थित हुए थे। यज्ञ में पवित्र नदियों और तीर्थों के जल की आवश्यकता होने पर ब्रह्मा के आह्वान से अग्निकुंड से विभिन्न तीर्थों का जल प्रकट हुआ। वही अग्निकुंड आज राजगीर का ब्रह्मकुंड माना जाता है। यज्ञ में बड़ी संख्या में ऋषि-महर्षियों की उपस्थिति भी बताई गई है।

राजगीर में पुरुषोत्तम मास के दौरान विशाल मेले का आयोजन होता है। लाखों श्रद्धालु प्राची, सरस्वती और वैतरणी नदियों सहित ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, न्यासकुंड, मार्कंडेय कुंड, गंगा-यमुना कुंड, काशीधारा कुंड, अनंतऋषि कुंड, सूर्यकुंड, राम-लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड, गौरी कुंड और नानक कुंड में स्नान कर लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि इन कुंडों में वर्षभर उष्ण जल प्रवाहित होता रहता है और इसका स्रोत आज भी अज्ञात है। पुरुषोत्तम मास को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम काल माना गया है।

किंवदंती के अनुसार हिरण्यकश्यपु ने भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा था कि उसकी मृत्यु रात-दिन, सुबह-शाम और बारह महीनों में से किसी भी महीने में न हो। बाद में ब्रह्मा को अपनी भूल का अहसास हुआ तो भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यपु के अंत के लिए तेरहवें महीने की रचना की। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यही अतिरिक्त मास मलमास या अधिक मास कहलाया।

मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध संस्थान टोंक के निदेशक बाबूलाल शास्त्री ने पुरुषोत्तम मास को दान, जप, तप और विष्णु आराधना का सर्वोत्तम काल बताते हुए श्रद्धालुओं से धार्मिक नियमों और सात्विक जीवन का पालन करने का आह्वान किया।

Pratahkal Bureau

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