कहानी वाला शंख: बाल उपन्यास पर ऑनलाइन साहित्यिक संगोष्ठी में गहन विमर्श
सलूम्बर में आयोजित ऑनलाइन संगोष्ठी में डॉ. विमला भंडारी के बाल उपन्यास “कहानी वाला शंख” पर देशभर के साहित्यकारों ने गहन विमर्श किया। संगोष्ठी में पुस्तक की कथावस्तु, बाल मनोविज्ञान और नैतिक मूल्य पर चर्चा हुई, जिसे बाल साहित्य के वरिष्ठ विद्वान और विशेषज्ञों ने सराहा।

सलूम्बर। बाल साहित्य के क्षेत्र में नई उपलब्धि के रूप में डॉ. विमला भंडारी द्वारा लिखित हाल ही में प्रकाशित बाल उपन्यास “कहानी वाला शंख” पर ऑनलाइन पुस्तक चर्चा संगोष्ठी का आयोजन सलूम्बर की प्रतिष्ठित सलिला संस्था द्वारा किया गया। देश भर के साहित्यकारों ने इस कार्यक्रम में भाग लेकर उपन्यास के बहुआयामी पहलुओं पर गहन विमर्श किया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता बाल साहित्य के वरिष्ठ विद्वान प्रोफेसर सुरेंद्र विक्रम, लखनऊ ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात अनुवादक और समीक्षक दिनेश कुमार माली, ओडिशा उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि बाल भास्कर पत्रिका की संपादक इंदिरा त्रिवेदी, भोपाल तथा विशिष्ट वार्ताकार डॉ. लता अग्रवाल, भोपाल ने भी अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन नीलम राकेश, लखनऊ ने कुशलतापूर्वक किया।
कार्यक्रम की शुरुआत सलिला संस्था की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. विमला भंडारी द्वारा इंदिरा त्रिवेदी को पुस्तक परिचय के लिए आमंत्रित करके की गई। इंदिरा त्रिवेदी ने उपन्यास के प्रकाशन, लेआउट, चित्र संयोजन और कथानक की विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए पुस्तक के आवरण पृष्ठ की संकल्पना को सार्थक बताया।
मुख्य अतिथि दिनेश कुमार माली ने “कहानी वाला शंख” का तुलनात्मक अध्ययन पाश्चात्य साहित्य के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने विक्रम-बेताल और पंचतंत्र जैसी परंपराओं से उपन्यास के कथानक की तुलना करते हुए इसे आधुनिक भारतीय बाल साहित्य में एक सशक्त कृति बताया। माली ने उपन्यास की बारह कहानियों—जिम्मी और बंदर, तेजा की यात्रा, टोनी की बरसाती छुट्टी, चिड़िया के चार सवाल, उजाले की ओर, शाबाश पल्लवी!, साइकिल की आत्मकथा—के विशिष्ट संदर्भ और अन्य भाषाओं के साहित्य से तालमेल को उजागर किया।
विशिष्ट वार्ताकार डॉ. लता अग्रवाल ने पुस्तक की कल्पनाशीलता और बच्चों की नैतिक एवं सृजनात्मक सोच पर इसके प्रभाव पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यह कृति बालकों की कल्पना को विस्तार देती है और उन्हें नैतिक मूल्यों से सहज रूप से जोड़ती है।
अध्यक्ष प्रोफेसर सुरेंद्र विक्रम ने बाल साहित्य के मानकों के आधार पर उपन्यास का विश्लेषण करते हुए इसकी कहानियों को हिंदी के बारह महीनों में प्रकट होने वाले ‘कहानी रूपी मोती’ बताते हुए शीर्षक “कहानी वाला शंख” का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि उपन्यास में रिबन, जमालुद्दीन और अन्य पात्रों के माध्यम से बाल मनोविज्ञान और प्राकृतिक परिवेश का सजीव चित्रण किया गया है।
कार्यक्रम में गुरुग्राम, भीलवाड़ा, गाजियाबाद, बीकानेर, अहमदाबाद, विदिशा सहित कई शहरों से साहित्यकारों ने भाग लेकर अपने विचार साझा किए। सभी ने उपन्यास की गहन कथावस्तु और बाल साहित्य में इसकी विशिष्टता को सराहा।
यह संगोष्ठी न केवल “कहानी वाला शंख” की साहित्यिक गुणवत्ता को उजागर करने में सफल रही, बल्कि बाल साहित्य के क्षेत्र में संवाद और बहस की नई दिशा भी प्रस्तुत की।
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Pratahkal Bureau
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