सलूम्बर जिला अस्पताल खुद बीमार: प्रसूता वार्ड में गंदगी, जर्जर दीवारों से नवजातों पर खतरा
सलूम्बर जिला अस्पताल के प्रसूता वार्ड में गंदगी, कचरे और जर्जर दीवारों के बीच नवजात शिशुओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। 8 अगस्त को नेता फल बांटने पहुंचे, लेकिन अस्पताल की बदहाली चर्चा में रही।

तस्वीर में सलूम्बर जिला अस्पताल परिसर के खुले हिस्से में पड़े कचरे के ढेर के बीच एक मवेशी नजर आ रहा है।
सलूम्बर। जिले के हजारों लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभालने वाला सलूम्बर का सबसे बड़ा और एकमात्र जिला अस्पताल इन दिनों बदहाल व्यवस्थाओं के कारण सवालों के घेरे में है। अस्पताल के प्रसूता वार्ड की स्थिति ऐसी है कि यहां प्रसव के बाद भर्ती मां और नवजात शिशुओं की सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्रसूता वार्ड में कई हिस्सों में गंदगी का अंबार लगा हुआ है। कोनों में कचरा पड़ा है और सफाई व्यवस्था बदहाल नजर आ रही है। इतना ही नहीं, वार्ड की दीवारों और छत के कई हिस्सों में प्लास्टर तक गिर रहा है। जर्जर स्थिति और गंदगी के बीच मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
प्रसव के बाद नवजात शिशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद संवेदनशील होती है। ऐसे में जिस वार्ड में नवजात बच्चों को रखा जाता है, वहां साफ-सफाई और संक्रमण से बचाव सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन सलूम्बर जिला अस्पताल के प्रसूता वार्ड की तस्वीर इसके उलट दिखाई दे रही है। गंदगी और जर्जर हालात के बीच सवाल उठ रहा है कि जिम्मेदारों को यह स्थिति दिखाई क्यों नहीं देती।
एक ओर सरकार अस्पतालों में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल के प्रसूता वार्ड की बदहाल तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।
8 अगस्त को पूर्व विधायक अमृतलाल मीणा की पुण्यतिथि के अवसर पर जिला अस्पताल में फल वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस दौरान जिले के कई नेता अस्पताल पहुंचे और प्रसूता वार्ड में जाकर मरीजों तथा उनके परिजनों को फल वितरित किए।
इस दौरान एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि जब नेता उसी वार्ड में पहुंचे थे, तो क्या उन्हें वहां की गंदगी और जर्जर हालत नजर नहीं आई? क्या मरीजों को फल बांटना ही जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है या अस्पताल की मूलभूत सुविधाओं और साफ-सफाई को लेकर सवाल उठाना भी उनकी जिम्मेदारी में शामिल है?
मरीजों के परिजनों ने अस्पताल की जर्जर स्थिति और गंदगी को लेकर विधायक शांता अमृतलाल मीणा के सामने अपनी परेशानी रखी। बताया गया कि कुछ दिनों बाद जिला अस्पताल नए परिसर में स्थानांतरित हो जाएगा और वहां बेहतर वार्ड तथा सफाई व्यवस्था होगी।
लेकिन सवाल यह है कि तब तक वर्तमान अस्पताल में भर्ती नवजात बच्चों और मरीजों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा। नया अस्पताल कब शुरू होगा और नई बिल्डिंग में मरीजों को बेहतर सुविधाएं कब मिलेंगी, यह भविष्य का विषय है। फिलहाल जो नवजात बच्चे इसी अस्पताल में भर्ती हैं, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की है।
क्या नई बिल्डिंग बनने तक पुराने अस्पताल की सफाई व्यवस्था को इसी तरह भगवान भरोसे छोड़ दिया जाएगा? क्या जर्जर दीवारों और गिरते प्लास्टर की मरम्मत नए अस्पताल के इंतजार में टाली जा सकती है? और यदि संक्रमण का खतरा है तो उससे बचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
विडंबना यह है कि नेता अस्पताल पहुंचे, मरीजों से मिले, फल वितरित किए और तस्वीरें भी बनीं, लेकिन इसी दौरान अस्पताल की बदहाल व्यवस्था पर सवाल उठाने की जरूरत शायद किसी को महसूस नहीं हुई। मरीजों को फल देकर उनकी सेहत की चिंता जताना अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन जिस वार्ड में वे फल खा रहे हैं, वहां सफाई व्यवस्था ही बदहाल हो तो स्वास्थ्य सेवा की स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यदि जनप्रतिनिधियों का अस्पताल दौरा केवल औपचारिकता बनकर रह जाए और मरीजों की वास्तविक समस्याएं वहीं की वहीं बनी रहें, तो ऐसे दौरों के उद्देश्य पर भी सवाल उठता है।
नया जिला अस्पताल निश्चित रूप से जिले के लिए बड़ी सौगात होगा और वहां बेहतर सुविधाओं की उम्मीद है। लेकिन तब तक वर्तमान अस्पताल में भर्ती मरीजों, खासकर प्रसूताओं और नवजात बच्चों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना अस्पताल प्रशासन और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की तत्काल जिम्मेदारी है।
नया भवन आने में समय लग सकता है, लेकिन कचरा उठाने में नहीं। नई बिल्डिंग में अस्पताल शुरू होने में वक्त लग सकता है, लेकिन गंदगी साफ करने में नहीं। नई सुविधाएं आने में समय लग सकता है, लेकिन जर्जर प्लास्टर की मरम्मत आज भी हो सकती है।
अब सवाल यही है कि जिला अस्पताल की यह बदहाल तस्वीर जिम्मेदारों की आंखें खोलती है या फिर नए अस्पताल के नाम पर पुराने अस्पताल की समस्याओं को भी नई इमारत तक टाल दिया जाता है। नया अस्पताल आने तक नवजात बच्चों की सुरक्षा और मरीजों की स्वच्छता की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

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