अरावली संरक्षण के लिए सलूम्बर में जनसैलाब, प्रशासन को सौंपा ज्ञापन
सलूम्बर में अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर जनआंदोलन, युवाओं और आदिवासी समाज ने सोनार माता मंदिर से कलेक्टर कार्यालय तक रैली निकालकर 100 मीटर नियम वापस लेने की मांग की। पर्यावरण संतुलन और भविष्य की सुरक्षा को लेकर प्रशासन को सौंपा गया ज्ञापन।

सलूम्बर। भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली के संरक्षण को लेकर सोमवार को सलूम्बर जिले में व्यापक जनआंदोलन देखने को मिला। युवाओं, ग्रामीणों और आदिवासी समाज के लोगों ने एकजुट होकर हालिया नीतिगत निर्णयों के खिलाफ सड़कों पर उतरते हुए पर्यावरण संरक्षण की मांग को बुलंद किया। यह प्रदर्शन न केवल एक विरोध था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का सामूहिक संकल्प भी था।
प्रदर्शनकारी सोनार माता मंदिर स्थित पहाड़ के नीचे भवानी कुंड पर एकत्रित हुए। यहां से विशाल रैली गांधी चौक, बस स्टैंड, आशीर्वाद गार्डन और डाल चौराहा होते हुए जिला कलेक्टर कार्यालय तक निकाली गई। रैली के दौरान ‘अरावली बचाओ—भविष्य बचाओ’, ‘100 मीटर नियम वापस लो’ और ‘पहाड़ नहीं काटने देंगे’ जैसे नारों से पूरा शहर गूंज उठा।
जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन को ज्ञापन सौंपा, जिसमें अरावली पर्वतमाला से जुड़े हालिया निर्णयों पर गहरी आपत्ति दर्ज कराई गई। ज्ञापन में बताया गया कि लगभग 2.5 अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन भौगोलिक संरचनाओं में से एक है और इसके साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर खतरा है।
प्रदर्शनकारियों ने चेताया कि यदि अरावली की प्राकृतिक ग्रीन वॉल कमजोर हुई तो उत्तर भारत को मरुस्थलीकरण, भीषण लू, धूल-आंधियों, वायु प्रदूषण और गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अरावली पर्वतमाला उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है, जहां की पहाड़ियां, जंगल, वनस्पति, जल स्रोत, जीव-जंतु और पक्षी मिलकर संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं।
आंदोलनकारियों का आरोप था कि अरावली से जुड़े हालिया निर्णय खनन लॉबी को लाभ पहुंचाने वाले हैं। 100 मीटर ऊंचाई से कम पहाड़ियों को संरक्षण के दायरे से बाहर किए जाने से अंधाधुंध खनन का रास्ता खुलेगा, जिससे भूजल रिचार्ज समाप्त होगा, जल संकट गहराएगा और क्षेत्र का भौगोलिक स्वरूप स्थायी रूप से नष्ट हो जाएगा। साथ ही, वन्यजीवों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर भी गंभीर संकट उत्पन्न होगा।
पर्यावरणविदों और ग्रामवासियों ने स्पष्ट किया कि अरावली क्षेत्र जैव-विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है और यहां किसी भी प्रकार का अवैज्ञानिक हस्तक्षेप पूरे पर्यावरण तंत्र को प्रभावित करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को लाखों वर्षों तक चुकानी पड़ सकती है।
प्रदर्शन के समापन पर आंदोलनकारियों ने सरकार और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप करते हुए 100 मीटर नियम को वापस लेने और अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग दोहराई।
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Pratahkal Bureau
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