सलूम्बर हत्याकांड में बड़ा फैसला: शव छिपाकर एटीएम से 60 हजार निकालने वाले तीनों दोषियों को उम्रकैद
सलूम्बर जिला एवं सत्र न्यायालय ने हत्या, शव छिपाने और मृतक के एटीएम से 60 हजार रुपये निकालने के मामले में तीन आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया।

सलूम्बर जिला एवं सत्र न्यायालय ने हत्या, साक्ष्य मिटाने और मृतक के एटीएम कार्ड से धनराशि निकालने के चर्चित मामले में तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। न्यायालय ने प्रत्येक आरोपी पर 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला एवं सत्र न्यायाधीश सलूम्बर रामेश्वर प्रसाद चौधरी ने सत्र प्रकरण संख्या 38/2025, राज्य बनाम नरेश एवं अन्य में 17 जुलाई 2026 को महत्वपूर्ण निर्णय पारित किया। न्यायालय ने हत्या, साक्ष्य नष्ट करने तथा लूट के अपराध में आरोपी नरेश उर्फ नाथूलाल, दौलतराम तथा काली उर्फ काजल को दोषसिद्ध पाते हुए आजीवन कारावास एवं 20-20 हजार रुपये के जुर्माने से दंडित किया।
लोक अभियोजक एडवोकेट रणजीत पूर्बिया ने बताया कि मृतक किशोर कुमार शर्मा 13 अगस्त 2021 को घर से अखबार के बंडल छोड़ने के लिए निकला था, जिसके बाद वह लापता हो गया। तीन दिन बाद 16 अगस्त 2021 को शाम करीब तीन बजे मावठा पहाड़ के जंगल क्षेत्र में एक अज्ञात शव मिलने की सूचना मिली। बाद में शव की पहचान किशोर कुमार शर्मा के रूप में हुई।
पुलिस अनुसंधान में सामने आया कि आरोपियों ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर किशोर कुमार का अपहरण किया और उसे जंगल में ले जाकर उसकी हत्या कर दी। हत्या के बाद शव को जंगल में फेंक दिया गया ताकि अपराध छिपाया जा सके। इसके बाद आरोपियों ने मृतक के एटीएम कार्ड का उपयोग कर उसके खाते से करीब 60 हजार रुपये भी निकाल लिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने न्यायालय के समक्ष मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत किए। लोक अभियोजक की ओर से कुल 26 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए तथा 106 दस्तावेजी साक्ष्य न्यायालय में पेश किए गए। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत चिकित्सकीय साक्ष्य, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, दस्तावेजी एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से यह सिद्ध हुआ कि किशोर कुमार की मृत्यु गले और श्वास नली को धारदार हथियार से काटे जाने के कारण हुई थी।
सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों का गहन परीक्षण करने के बाद न्यायालय ने तीनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/120-बी, 201/120-बी एवं 394 के तहत दोषी करार दिया। न्यायालय ने हत्या जैसे जघन्य अपराध में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को विश्वसनीय माना।
इस मामले की विशेष बात यह रही कि पूरे प्रकरण में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। इसके बावजूद पुलिस अनुसंधान, वैज्ञानिक साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा अन्य परिस्थितिजन्य प्रमाणों के आधार पर अभियोजन पक्ष अपराध सिद्ध करने में सफल रहा। लोक अभियोजन की ओर से इस मामले की प्रभावी पैरवी एडवोकेट रणजीत पूर्बिया द्वारा की गई। न्यायालय के फैसले के साथ इस मामले का विधिक पटाक्षेप हो गया और यह निर्णय परिस्थितिजन्य एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर हत्या जैसे गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

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