राजस्थान में आगामी पंचायतीराज चुनाव 2026 से पहले भजनलाल सरकार द्वारा घोषित नई शैक्षणिक योग्यता ने भाजपा संगठन के भीतर खामोश लेकिन गहरी हलचल पैदा कर दी है। वार्ड पंच के लिए 10वीं पास और सरपंच पद के लिए 12वीं पास अनिवार्य करने के फैसले ने पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में असंतोष की तेज़ लहर पैदा कर दी है। सार्वजनिक रूप से कोई विरोध नहीं दिखता, लेकिन पार्टी की तहों के भीतर दबा असंतोष अब स्पष्ट रूप से महसूस होने लगा है।

इसी आंतरिक माहौल को समझने के लिए किए गए एक विशेष संवाद में भाजपा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने नाम न उजागर करने की शर्त पर पूरे घटनाक्रम को “गैर-जनहितैषी” और “वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के भविष्य के विरुद्ध” बताया। कार्यकर्ता के अनुसार, संगठन में वर्षों से सक्रिय कई लोग अब खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, विशेषकर वे जो 50 से 60 वर्ष की आयु के बीच हैं और जिन्होंने सामाजिक परिस्थितियों के कारण 10वीं–12वीं की शिक्षा पूरी नहीं की थी।

कार्यकर्ता ने कहा कि भाजपा उन्हें पेज प्रमुख, पन्ना प्रमुख और विभिन्न संगठनों की बैठकों में तो महत्वपूर्ण भूमिका देती है, लेकिन जब पद देने या चुनावी टिकट की बारी आती है, तो वही कार्यकर्ता योग्यता के आधार पर बाहर कर दिए जाते हैं। उनके शब्दों में, “भाजपा हमें एक कॉर्पोरेट कंपनी के वर्कर की तरह इस्तेमाल करती है। मीटिंगों में सहारा लेती है, लेकिन चुनाव के दौरान हम जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ता पीछे छोड़ दिए जाते हैं। यह फैसला हमारी पूरी राजनीतिक यात्रा पर एक तरह से विराम लगा देता है।”

उन्होंने कठोर स्वर में सवाल उठाया कि जब चुनाव लड़ने का रास्ता ही बंद कर दिया जाए, तो सक्रिय कार्यकर्ता आखिर क्यों पार्टी के लिए लगातार मेहनत करते रहें। उनका आरोप है कि यह निर्णय बुजुर्ग और अनुभवी कार्यकर्ताओं के योगदान की अनदेखी करता है और ग्रामीण नेतृत्व की पारंपरिक संरचना को झटका देता है।

राज्य सरकार ने इन योग्यताओं को पंचायत स्तर पर ‘‘प्रशासनिक दक्षता’’ और ‘‘शैक्षणिक गुणवत्ता’’ बढ़ाने का कारण बताते हुए लागू किया है, लेकिन चुनावी माहौल के ठीक पहले आए इस फैसले ने पार्टी के भीतर असहजता को और बढ़ा दिया है। कई कार्यकर्ता इसे ऐसे परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं, जो पार्टी की जड़ मजबूत करने वाले पुराने कार्यकर्ताओं को धीरे-धीरे किनारे कर देगा।

हालांकि भीतर ही भीतर यह असंतोष तेजी से फैल रहा है, लेकिन अभी तक किसी भी स्तर पर इसका खुला विरोध सामने नहीं आया है। फिर भी संकेत स्पष्ट हैं कि यदि समाधान नहीं निकला, तो पंचायत चुनावों से पहले यह चिंगारी बड़ा रूप ले सकती है और संगठनात्मक एकजुटता पर प्रभाव डाल सकती है। राजस्थान की सियासत में पंचायतों का केंद्रीय स्थान होने के कारण यह मुद्दा आने वाले महीनों में राजनीतिक तापमान को और बढ़ा सकता है।

Pratahkal Bureau

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