राजसमंद में बेखौफ बजरी माफिया: क्या प्रशासन की कार्रवाई महज कागजी खानापूर्ति? बनास की छाती चीर रहे डंपर
राजसमंद में अवैध बजरी खनन पर प्रशासन का अभियान फेल साबित हो रहा है। बनास नदी क्षेत्र में पुलिस और माइनिंग विभाग की कार्रवाई के बावजूद माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। राहुल आचार्य की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें कैसे ओड़ा, मोही और पीपली आचार्यान में धड़ल्ले से हो रहा है अवैध खनन और क्या है प्रशासन की मिलीभगत का सच।

राजस्थान सरकार के सख्त तेवरों और अरावली की वादियों को बचाने के दावों के बीच राजसमंद जिले से एक ऐसी तस्वीर उभर रही है, जो शासन के इकबाल पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जिले में अवैध बजरी खनन का काला कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। बनास नदी के आंचल को छलनी कर रहे बजरी माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि पुलिस और माइनिंग विभाग की छिटपुट कार्रवाइयां उनके लिए महज एक 'स्पीड ब्रेकर' बनकर रह गई हैं। हालात यह हैं कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए प्रतिदिन सैकड़ों वाहन अवैध बजरी का परिवहन कर रहे हैं, जिससे यह चर्चा आम हो गई है कि क्या प्रशासन का यह अभियान सिर्फ दिखावा है या फिर तंत्र और माफिया के बीच कोई गहरा गठजोड़ काम कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम की हकीकत 15 जनवरी की उस कार्रवाई से समझी जा सकती है, जब जिला पुलिस और डीएसटी टीम ने रेलमगरा तहसील के ओड़ा क्षेत्र में दबिश देकर अवैध खनन में लिप्त डंपर, ट्रैक्टर और एलएनटी मशीनें जब्त की थीं। उस वक्त लगा था कि शायद अब माफियाओं पर नकेल कसी जाएगी, लेकिन विडंबना देखिए कि इस कार्रवाई के महज 48 घंटे भी नहीं बीते थे कि ओड़ा, पीपली आचार्यान, मोही और राज्यावास जैसे क्षेत्रों में फिर से मशीनों की गूंज सुनाई देने लगी। जिस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए माइनिंग विभाग ने बॉर्डर होमगार्ड तैनात किए हैं, वहीं से धड़ल्ले से बजरी का दोहन होना सिस्टम की विफलता की कहानी खुद बयां कर रहा है।
क्षेत्रीय सूत्रों और ग्रामीणों के दावों ने इस मामले में और भी सनसनी फैला दी है। आरोप है कि बॉर्डर होमगार्ड के कुछ जवान माफियाओं के साथ सांठगांठ कर उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। आलम यह है कि मोही, पीपली आचार्यान, राज्यावास और ओड़ा गांव में न केवल नदी क्षेत्र, बल्कि किसानों की निजी खातेदारी जमीनों को भी निशाना बनाया जा रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे बार-बार प्रशासन को सूचित करते हैं, लेकिन अधिकारी मौके पर पहुंचने की जहमत तक नहीं उठाते। प्रतिदिन 100 से अधिक डंपर और 500 से ज्यादा ट्रैक्टरों का बेरोकटोक दौड़ना इस अवैध कारोबार के विशाल स्वरूप को दर्शाता है।
अब सवाल यह उठता है कि जब सरकार शून्य सहिष्णुता की नीति पर काम कर रही है, तो राजसमंद में यह अभियान विफल क्यों साबित हो रहा है? क्या जिला प्रशासन और माइनिंग विभाग के अधिकारी केवल लीपापोती कर उच्चाधिकारियों को गुमराह कर रहे हैं? बनास नदी के अस्तित्व और पर्यावरण पर मंडराते इस खतरे के बीच अब सबकी नजरें राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या वाकई इन रसूखदार माफियाओं पर कोई निर्णायक प्रहार होगा, या फिर राजसमंद की यह बेशकीमती खनिज संपदा इसी तरह 'सफेदपोशों' की मिलीभगत की भेंट चढ़ती रहेगी? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

Pratahkal Bureau
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