सुप्रीम कोर्ट का फैसला: अरावली के 100 मीटर से नीचे के पर्वत संरक्षण से बाहर, इतिहास और पर्यावरण पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: अब केवल 100 मीटर से ऊँचे पर्वत ही अरावली में शामिल होंगे, जबकि छोटे पर्वत संरक्षण से बाहर। राजसमंद और मेवाड़ के इतिहास, पर्यावरण और जल संरक्षण पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने संरक्षणात्मक कदम उठाने की चेतावनी दी है।

आमेट/राजसमंद। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम निर्णय जारी किया है, जिसके अनुसार अब केवल 100 मीटर से ऊँचे पर्वत ही अरावली श्रेणी में शामिल होंगे। 100 मीटर से नीचे के पर्वत संरक्षण से बाहर किए जाएंगे, जिससे उनकी खुदाई और खनन का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। इस फैसले से स्थानीय जनता और पर्यावरणविदों में चिंता की लहर दौड़ गई है।
अरावली पर्वतमालाएँ केवल भौगोलिक संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि मेवाड़ की आन, बान और शान की प्रतीक मानी जाती हैं। इन वादियों ने इतिहास में महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों को सुरक्षित आश्रय दिया और मुगलों से लड़ाई में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वहीं, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ये पर्वत केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये नदियों और जल स्रोतों को सुरक्षित रखते हैं, भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करते हैं और कृषि योग्य जमीनों को संरक्षित रखते हैं। संरक्षण से बाहर किए जाने पर इन क्षेत्रों में वनस्पति और वन्य जीवों पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस निर्णय के बाद केवल ऊँचे पर्वत संरक्षित रहेंगे, जबकि छोटे पहाड़ खनन और अवैध उत्खनन के लिए खुले होंगे। इस प्रकार, राजसमंद और आसपास के क्षेत्रों में पहले से चल रहे खनन कार्यों का प्रभाव और भी गंभीर हो सकता है। उदाहरण के लिए, मार्बल खदानों से प्रभावित क्षेत्रों में पहाड़ों के गायब होने के कारण गहरी खाईयां बन चुकी हैं, जो न केवल पर्यावरणीय बल्कि सामाजिक समस्याओं का कारण भी बन रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर सरकार, प्रशासन और समाज को चेतावनी दी है कि पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। अरावली पर्वत श्रृंखला केवल इतिहास और संस्कृति की धरोहर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवनदायिनी भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते पुनर्विचार और संरक्षणात्मक कदम उठाना ही इस क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रख सकता है।
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Pratahkal Bureau
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