आत्मनिर्भर ग्राम पंचायतों के लिए पसुन्द सरपंच अयन जोशी ने रखी ठोस कार्ययोजना, जयपुर में मंथन
जयपुर में राज्य वित्त आयोग की बैठक में पसुन्द सरपंच अयन जोशी ने ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने का खाका पेश किया। क्या यह सुझाव ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकेंगे? जानिए उन प्रमुख मांगों के बारे में, जो बदल सकती हैं पंचायत का भविष्य।

जयपुर में सातवें राज्य वित्त आयोग की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने की। इस उच्च-स्तरीय बैठक में प्रदेश की ग्राम पंचायतों के समक्ष उत्पन्न वित्तीय चुनौतियों, संसाधनों की उपलब्धता और ग्रामीण विकास की नई कार्ययोजनाओं पर गहन विचार-विमर्श किया गया। बैठक में ग्राम पंचायत पसुन्द के युवा सरपंच अयन जोशी ने विशेष रूप से भाग लेते हुए ग्रामीण विकास की दिशा में कई महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए, जो पंचायतों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।
सरपंच अयन जोशी ने बैठक के दौरान सबसे प्रमुख मुद्दा राजसमंद नगर परिषद के पैराफेरी क्षेत्र का उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि इन क्षेत्रों में होने वाले भूमि आवंटनों का शुल्क वर्तमान में नगर परिषद के कोष में जाता है, जबकि उस राजस्व पर संबंधित ग्राम पंचायतों का भी अधिकार होना चाहिए। उन्होंने पुरजोर मांग की कि इस राजस्व का उचित हिस्सा पंचायतों को हस्तांतरित किया जाए ताकि उनकी निजी आय में वृद्धि हो सके और वे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकें। इसके अतिरिक्त, जोशी ने उत्कृष्ट कार्य करने वाली पंचायतों के लिए प्रोत्साहन स्वरूप अतिरिक्त अनुदान और सम्मान की व्यवस्था करने का प्रस्ताव रखा, ताकि पंचायत प्रतिनिधियों में नवाचार और विकास के प्रति उत्साह का संचार हो सके।
बैठक में 'पंचायत विकास नवाचार निधि' स्थापित करने का सुझाव भी अयन जोशी द्वारा दिया गया। उनका मानना है कि इस निधि के माध्यम से नगर परिषदों की तर्ज पर पंचायतों के लिए भी दीर्घकालिक मास्टर प्लान तैयार किए जा सकेंगे, जिससे गांवों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हुए वित्तीय संसाधनों का बेहतर नियोजन हो पाएगा। उन्होंने मौजूदा वित्तीय योजनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अधिकांश योजनाएं वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर संचालित हैं, जबकि पिछले सोलह वर्षों में ग्रामीण जनसंख्या और आधारभूत ढांचे में व्यापक परिवर्तन आया है। अंत में, उन्होंने राज्य सरकार और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर देते हुए कहा कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रचार-प्रसार में पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्रामीण विकास की सफलता में सरकार और पंचायतों का संतुलित समन्वय ही विकास की वास्तविक धुरी है।

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