केलवा क्षेत्र के सियाणा में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में उमड़े श्रद्धालु, महाराज ने रामायण और महाभारत के प्रसंगों से दिया सत्य मार्ग पर चलने का संदेश।

केलवा क्षेत्र के समीपवर्ती सियाणा स्थित श्री धेनु गोपाल गौशाला में एक भव्य एवं दिव्य सत्संग तथा धार्मिक प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और अटूट भक्ति भाव के साथ संपन्न हुआ। इस पावन आध्यात्मिक आयोजन में आस-पास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्त्री-पुरुष उपस्थित रहे, जिन्होंने भक्ति रस की रसधार में सराबोर होकर परम पूज्य संत प्रेम नारायण गेहूं खेड़ी महाराज के मुखारविंद से निःसृत मंगलकारी संत वचनों का श्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित किया।

कार्यक्रम को मुख्य रूप से संबोधित करते हुए श्रद्धेय संत प्रेम नारायण गेहूं खेड़ी महाराज ने अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायक प्रवचनों में मानव जीवन की सार्थकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में सदैव धर्म और नीति के मार्ग पर ही अग्रसर होना चाहिए, क्योंकि जो मनुष्य धर्म और सत्य का संबल थामे रहते हैं, सर्वशक्तिमान भगवान स्वयं हमेशा उनकी रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। महाराज ने सनातन ग्रंथों रामायण और महाभारत के प्रेरक प्रसंगों का सजीव उल्लेख करते हुए उपस्थित जनसमुदाय को समझाया कि अधर्म के मार्ग पर चलने वाले महाबली रावण का अंत इतना भयावह था कि स्वयं उसके सगे भाई विभीषण तक ने उसका साथ छोड़ दिया था; इसके विपरीत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के सत्य मार्ग पर अडिग रहने के कारण एक नन्हीं गिलहरी से लेकर पक्षीराज गिद्धराज जटायु तक समस्त प्राणी जगत उनके सहयोग के लिए तत्पर खड़ा रहा।

व्यासपीठ से भक्ति की महिमा को प्रतिपादित करते हुए संत महाराज ने आगे कहा कि सच्ची भक्ति पूर्ण विश्वास, निष्कपट निष्ठा और अनन्य समर्पण में ही निहित होती है। यदि मनुष्य सांसारिक मायाजाल को त्यागकर एकमात्र पूर्ण परमात्मा पर अपना अटूट भरोसा और विश्वास सुदृढ़ कर ले, तो विषम से विषम परिस्थितियों में भी वही ईश्वर उसका सबसे बड़ा और सच्चा सहारा बनकर उभरते हैं। महाभारत के ऐतिहासिक प्रसंग का मार्मिक दृष्टांत देते हुए उन्होंने कहा कि जब भरी सभा में द्रौपदी ने अपनी संपूर्ण शक्तियों और संसार की आशा को त्यागकर पूर्ण शरणागति व परम विश्वास के साथ द्वारिकाधीश भगवान को पुकारा, तब योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अविलंब प्रकट होकर उसकी लाज बचाई। इस अकाट्य सत्य को आत्मसात करते हुए मनुष्य को अपने जीवन में नश्वर संसार और अन्य किसी भी व्यक्ति से सुख की मिथ्या अपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए।

आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करते हुए महाराज ने संपूर्ण मानव जाति को आपसी प्रेम, करुणा, दया और सद्भाव का मर्मस्पर्शी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी असहाय या अन्य व्यक्ति को मानसिक अथवा शारीरिक दुःख पहुंचाना सबसे बड़ा पाप है। यह अमूल्य मानव जीवन क्षणभंगुर है और पंचतत्व से निर्मित यह नश्वर शरीर एक दिन अवश्य ही नष्ट हो जाने वाला है, इसलिए क्षणिक अहंकार, मद और मोह-माया के बंधनों में पड़कर अपने समय को व्यर्थ गंवाने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर की सच्ची भक्ति में अपना चित्त और मन लगाना चाहिए। मृत्यु के सार्वभौमिक सत्य पर बोलते हुए उन्होंने प्रबुद्ध समाज को आश्वस्त किया कि काल चक्र अथवा मृत्यु से भयभीत होने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रत्येक सनातन धर्मी को निरंतर सत्कर्म, परोपकार और प्रभु भक्ति के पावन मार्ग पर चलते हुए अपने इस मानव जीवन को सार्थक, सफल और वंदनीय बनाना चाहिए। आरती और महाप्रसाद के वितरण के साथ इस महान धार्मिक समागम का समापन हुआ, जिसने संपूर्ण क्षेत्र के वातावरण को पूरी तरह से धर्ममय और अलौकिक ऊर्जा से ऊर्जस्वित कर दिया।

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