राजसमंद, 21 अप्रैल। आधुनिकता की अंधी दौड़ और पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण जहां पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे विस्मृति के गर्त में जा रहे हैं, वहीं राजसमंद के उपनगर धोइंदा में एक ऐसी सुखद और प्रेरक पहल देखने को मिली जिसने समाज को अपनी जड़ों की ओर लौटने का स्पष्ट संदेश दिया है। स्थानीय निवासी मुकेश कुमावत ने अपनी धर्म बहन के विवाह के मांगलिक अवसर पर किसी विलासी वाहन के बजाय बैलगाड़ी पर सवार होकर मायरा भरने का निर्णय लेकर सबको अचंभित कर दिया।

धोइंदा निवासी मुकेश कुमावत ने अपनी धर्म बहन रुक्मणी देवी के विवाह उत्सव पर पूर्णतः पारंपरिक पद्धति को जीवंत करने का संकल्प लिया था। मंगलवार को धोइंदा बस स्टैंड पर जब यह भव्य दृश्य उभरा, तो वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। बैलगाड़ी को रंग-बिरंगी सजावट से अत्यंत आकर्षक रूप दिया गया था, वहीं बैलों को भी रंगीन धारियों, रिबन और मोरपंख से पारंपरिक शैली में सजाया गया था। मायरे की समस्त सामग्री से सुसज्जित इस बैलगाड़ी पर स्वयं मुकेश कुमावत अपनी पत्नी मायादेवी के साथ मारवाड़ी वेशभूषा धारण कर सवार हुए और स्वयं ही बैलगाड़ी हांकते हुए गंतव्य की ओर प्रस्थान किया। इस दौरान वातावरण डीजे पर बजते पारंपरिक मायरे के गीतों, महिलाओं के मंगल गान और थाली-मादल की सुरीली ध्वनियों से गुंजायमान रहा।

यह अनूठी शोभायात्रा धोइंदा के गणेश चौक, कैलाश चौराहा और तेजाजी चौक जैसे प्रमुख मार्गों से होती हुई स्कूल मैदान के समीप स्थित धर्म बहन के निवास पर पहुंची। रास्ते भर इस दृश्य को देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा और जगह-जगह इस पारंपरिक पहल का भव्य स्वागत किया गया। उल्लेखनीय है कि मुकेश कुमावत का यह प्रयास निरंतरता का परिचायक है; गत वर्ष भी उन्होंने राजनगर में अपनी एक अन्य धर्म बहन के यहां इसी प्रकार बैलगाड़ी से मायरा भरकर संस्कृति प्रेम प्रकट किया था। सगी बहन या बेटी न होने के बावजूद धर्म बहनों के प्रति उनका यह समर्पण क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

एक सफल आलू व्यापारी होने के नाते मुकेश कुमावत के पास ऑडी जैसी लग्जरी कार उपलब्ध है, किंतु भौतिक सुख-सुविधाओं के बीच उन्होंने अपनी गौरवशाली संस्कृति को प्राथमिकता दी। उनका मानना है कि पारंपरिक रस्में न केवल हमें मानसिक सुकून देती हैं, बल्कि हमारी पहचान को भी सुरक्षित रखती हैं। स्थानीय नागरिकों ने इस पहल की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए कहा कि यदि ऐसी परंपराओं को नहीं सहेजा गया, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल पुस्तकों के पन्नों तक सीमित पाएंगी। यह आयोजन न केवल एक रस्म थी, बल्कि राजसमंद की धरती से समूचे समाज के लिए संस्कृति संरक्षण की एक प्रेरणादायक पुकार बनकर उभरी है।

Pratahkal Newsroom

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