गुलेल से अरावली में हरियाली का संकल्प, दुर्गम पहाड़ियों पर महिलाओं ने बिखेरे हजारों सीड्स बॉल
राजसमंद की अरावली पहाड़ियों पर महिलाओं ने गुलेल से हजारों सीड्स बॉल पहुंचाकर हरियाली बचाने की अनोखी पहल शुरू की।

तस्वीर में राजसमंद की पहाड़ियों के पास महिलाएं और युवतियां हाथों में गुलेल थामे नजर आ रही हैं।
गुलेल से निकला हर निशाना शिकार के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति को नया जीवन देने के लिए था। मेरा युवा भारत राजसमंद, कॅरियर संस्थान राजसमंद और नगर पालिका देवगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को सीड्स बॉल अभियान के दूसरे चरण का आयोजन किया गया। अभियान के तहत युवतियों और महिलाओं ने कंधों पर सीड्स बॉल की थैलियां, हाथों में गुलेल और आंखों में हरियाली का संकल्प लेकर गोरिधाम, छापली और दिवेर की नाल की ऊंची एवं दुर्गम पहाड़ियों तक पहुंचकर हजारों सीड्स बॉल का छिड़काव किया।
कई किलोमीटर तक पैदल चलकर अरावली की कठिन पहाड़ियों के शिखरों तक पहुंची महिलाओं ने उन स्थानों पर सीड्स बॉल पहुंचाए, जहां सामान्य परिस्थितियों में पौधारोपण करना लगभग असंभव माना जाता है। कठिन चढ़ाई और पथरीले रास्तों की चुनौतियों के बावजूद उन्होंने गुलेल की सहायता से हजारों सीड्स बॉल उन ढलानों पर पहुंचाए, जहां पारंपरिक तरीके से पौधे लगाना संभव नहीं है।
जब महिलाओं ने अरावली की ऊंची पहाड़ियों की ओर गुलेल से निशाना साधा तो उनका उद्देश्य किसी लक्ष्य को भेदना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली का भविष्य तैयार करना था। इस सामूहिक प्रयास ने संदेश दिया कि प्राकृतिक आपदाओं या मानवीय कारणों से हुए पर्यावरणीय नुकसान को सामुदायिक सहभागिता से सुधारा जा सकता है।
संस्था से जुड़ी आरती कच्छावा ने बताया कि संस्था पिछले आठ वर्षों से राजसमंद जिले के भीम, देवगढ़, कुंभलगढ़, आमेट, राजसमंद और चित्तौड़गढ़ में उन स्थानों पर पर्यावरण संरक्षण का कार्य कर रही है, जहां सामान्य परिस्थितियों में पौधे ले जाकर रोपना संभव नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में गुलेल की सहायता से बीज पहुंचाकर संस्था ने पर्यावरण संरक्षण का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है।
अरावली पर्वतमाला राजस्थान की पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और इसे बचाने के लिए सीड्स बॉल अभियान एक प्रभावी प्रयास के रूप में सामने आया है। इस कार्यक्रम में आरती कच्छावा, भावना पालीवाल, भावना सुखवाल, किरण सुखवाल, टीना टांक, किरण सोनी, तनीषा देवड़ा, नेहा, दर्शना पालीवाल, हर्षिता सोनी, मोनिका टांक, खुशी, अदिति सोनी, कविता कंवर, गीता देवी और कमला देवी ने सहयोग किया।
सीड्स बॉल की प्रेरणा केन्या से राजसमंद तक
संस्था अध्यक्ष भावना पालीवाल ने बताया कि इस अभियान की प्रेरणा केन्या से मिली। केन्या में वर्षों से ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं, जहां महिलाएं सीड्स बॉल बनाकर वनों की बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसी मॉडल को अपनाते हुए राजस्थान की कठोर जलवायु और बंजर क्षेत्रों में हरियाली लाने के लिए महिलाओं ने यह पहल शुरू की।
उन्होंने बताया कि यह प्रयास साबित करता है कि पर्यावरण संरक्षण की कोई सीमाएं नहीं होतीं और दुनिया के किसी भी हिस्से में सफल विचार परिवर्तन की नई शुरुआत कर सकता है।
क्या है सीड्स बॉल और कैसे होती है तैयार
सीड्स बॉल उपजाऊ मिट्टी, गोबर या वर्मीकंपोस्ट (जैविक खाद) और पानी के संतुलित मिश्रण से तैयार किए गए छोटे गोलाकार गोले होते हैं। देखने में ये मिट्टी के लड्डू जैसे दिखाई देते हैं, लेकिन इनके भीतर पौधों के विकास की पूरी प्रक्रिया छिपी होती है।
पर्यावरण संरक्षण अभियान में जैव विविधता का विशेष ध्यान रखा गया है। सीड्स बॉल के अंदर केवल स्थानीय और मजबूत प्रजातियों के बीज लगाए गए हैं, जो राजस्थान की शुष्क जलवायु को सहन कर सकें। इनमें नीम, पीपल, जामुन, रोहिड़ा, शीशम और करंज जैसे पेड़ों के बीज शामिल हैं।
एक सीड्स बॉल तैयार करने में मात्र 2 रुपये की लागत आती है। यह हल्की और सस्ती होने के कारण आसानी से दूर तक पहुंचाई जा सकती है। इसके प्रयोग में न तो गड्ढा खोदने की आवश्यकता रहती है और न ही शुरुआती दिनों में पौधों को पानी देने की चिंता रहती है।
दावानल से प्रभावित जंगलों के लिए वैज्ञानिक समाधान
जंगल की आग केवल बड़े वृक्षों को ही नष्ट नहीं करती, बल्कि मिट्टी की सबसे ऊपरी और उपजाऊ परत को भी जला देती है। आग के कारण जमीन में मौजूद प्राकृतिक बीज और सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में प्रकृति का स्वतः पुनर्जीवन धीमा हो जाता है।
सीड्स बॉल तकनीक ऐसी पर्यावरणीय समस्या के लिए स्थायी और वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध कराती है। हल्के और मजबूत होने के कारण इन्हें अरावली की ऊंची और दुर्गम पहाड़ियों तक दूर-दूर तक पहुंचाया जा सकता है। एक ही अभियान में हजारों सीड्स बॉल के छिड़काव से मानसून की पहली बारिश के साथ हजारों नए पौधों के अंकुरित होने की संभावना बनती है।
यह अभियान दावानल से प्रभावित भूमि और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में हरियाली लौटाने के लिए सामुदायिक भागीदारी पर आधारित पर्यावरण संरक्षण का एक नया उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।

Pratahkal Hub
प्रातःकाल हब, दै.प्रातःकाल की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा प्रातःकाल हब राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।"
