जिले के केलवा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर लापरवाही उजागर हुई है, जिसने संपूर्ण चिकित्सा तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार को मीडिया टीम द्वारा किए गए औचक निरीक्षण में अस्पताल की व्यवस्थाएं पूरी तरह भगवान भरोसे नजर आईं। अस्पताल में चिकित्सकों की अनुपस्थिति के बीच नर्सिंग कर्मचारी धड़ल्ले से मरीजों का उपचार करते दिखाई दिए, जबकि नियमों के अनुसार चिकित्सकीय जांच, उपचार एवं दवा लिखने का कानूनी अधिकार केवल पंजीकृत चिकित्सक को ही प्राप्त है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस केलवा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कुल तीन चिकित्सकों के पद स्वीकृत हैं। वर्तमान में इन तीन पदों में से एक चिकित्सक एपीओ (आदेश की प्रतीक्षा में) चल रहे हैं, जबकि दूसरे चिकित्सक अवकाश पर हैं। ऐसे में तीसरे चिकित्सक डॉ. सुनील निठारवाल पर अस्पताल की जिम्मेदारी थी, लेकिन वे भी सुबह से ही चिकित्सालय में मौजूद नहीं मिले। अस्पताल के अन्य कर्मचारियों ने बताया कि अनुपस्थित चिकित्सक से फोन के माध्यम से संपर्क करने का लगातार प्रयास किया गया, परंतु उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। यहां तक कि कर्मचारियों द्वारा उनके सरकारी आवास पर जाकर भी संपर्क करने की कोशिश की गई, मगर वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला।

हैरानी की बात यह रही कि जब मीडिया टीम द्वारा इस संबंध में प्रशासनिक अधिकारियों से जानकारी ली गई, तो अधिकारियों ने दावा किया कि चिकित्सक अस्पताल परिसर में ही मौजूद हैं। इसके विपरीत, धरातल पर मौके पर चिकित्सक दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं दिए। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठता है कि आखिर चिकित्सालय में आए सैकड़ों मरीजों का उपचार कौन कर रहा था और उनकी जीवन रक्षा की जिम्मेदारी किसके पास थी?

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, गुरुवार को अस्पताल में करीब 225 से 250 मरीजों की ओपीडी दर्ज की गई थी। मुख्य चिकित्सक की अनुपस्थिति में इस भारी भीड़ और मरीजों की जांच व उपचार का पूरा कार्य नर्सिंग स्टाफ द्वारा ही संभाला जा रहा था। नियमों के तहत नर्सिंग कर्मचारी स्वतंत्र रूप से न तो मरीजों को दवा लिख सकते हैं और न ही मुख्य चिकित्सक की भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।

निरीक्षण के दौरान दवा वितरण काउंटर पर भी गंभीर और हैरान करने वाली अनियमितता सामने आई। वहां एक मरीज की पर्ची पर डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं होने के बावजूद दवा वितरण की प्रक्रिया धड़ल्ले से चल रही थी। जब मीडिया टीम ने इस संबंध में काउंटर पर मौजूद कर्मचारी से सवाल किया, तो उसने अपनी गलती छुपाने के लिए तत्काल वह पर्ची वापस ले ली। हालांकि, तब तक बड़ी संख्या में अन्य मरीजों को बिना हस्ताक्षर वाली पर्चियों पर दवाइयां वितरित की जा चुकी थीं।

गौरतलब है कि केलवा सीएचसी जैसे महत्वपूर्ण अस्पताल में प्रतिदिन दुर्घटना, हेड इंजरी (सिर की गंभीर चोट), गंभीर बीमारियों और प्रसूति संबंधी मामलों के मरीज आपातकालीन स्थिति में पहुंचते हैं। ऐसे संवेदनशील केंद्र पर चिकित्सक की अनुपस्थिति मरीजों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ मानी जा रही है। यदि इस लापरवाही के दौरान किसी गंभीर मरीज की हालत बिगड़ जाती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता, यह आज सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

यह गंभीर मामला केवल एक चिकित्सक की गैरहाजिरी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे जिला स्वास्थ्य तंत्र की लचर कार्यप्रणाली और ढीली निगरानी व्यवस्था की पोल खोलता है। अब क्षेत्र की जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जिला स्वास्थ्य प्रशासन मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों व कार्मिकों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करता है या फिर हमेशा की तरह यह मामला भी कागजी जांच तक सिमट कर रह जाएगा। स्थानीय ग्रामीणों और पीड़ित मरीजों ने अस्पताल की व्यवस्थाओं में तत्काल सुधार करने, चिकित्सकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने तथा इस घोर लापरवाही के दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की पुरजोर मांग की है।

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