राजसमंद। राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित केलवा थाना क्षेत्र का झांझर गांव आज एक ऐसी मानवीय त्रासदी का गवाह बना है, जिसने विकास के दावों और प्रशासनिक सतर्कता की कलई खोलकर रख दी है। झांझर की टीएसएल माइंस (TSL Mines) में काम के दौरान हुई मदन भील की मौत अब महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता और पूंजीपतियों के रसूख की एक भयावह दास्तां बन गई है। एक ओर जहां परिजन अपने कलेजे के टुकड़े को खोने के गम में डूबे हैं, वहीं दूसरी ओर रसूखदार लोग इस मौत की कीमत लगाकर कानून के फंदे से बचने की जुगत में मशगूल दिखे।

घटनाक्रम के अनुसार, माइंस में कार्य के दौरान मदन भील एक अनियंत्रित डंपर की चपेट में आ गया। बताया जा रहा है कि डंपर के रिवर्स लेते समय मदन उसके नीचे दब गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद माइंस प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर संचालित हो रही इस माइंस में न तो मौके पर प्राथमिक उपचार की कोई व्यवस्था थी और न ही सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा था। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि हादसे के तुरंत बाद माइनिंग विभाग या पुलिस को सूचित करने के बजाय, शव को आनन-फानन में अस्पताल भेज दिया गया। नियमों के मुताबिक, माइंस में किसी भी अनहोनी की स्थिति में संबंधित विभागों को तत्काल सूचना देना अनिवार्य है, लेकिन यहाँ सूचना देने में हुई देरी ने मिलीभगत की आशंकाओं को जन्म दे दिया है।

मदन भील की मौत के बाद सबसे बड़ा विवाद उसकी उम्र को लेकर खड़ा हो गया है। परिजनों द्वारा प्रस्तुत आधार कार्ड के दस्तावेज मदन को नाबालिग बता रहे हैं। यदि यह दस्तावेज सत्य प्रमाणित होते हैं, तो यह बाल श्रम कानून और माइंस एक्ट का खुला उल्लंघन है। हालांकि, केलवा पुलिस इस मामले में बेहद सतर्क रुख अपना रही है। पुलिस का कहना है कि आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों की सघन जांच जारी है और किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच रिपोर्ट का इंतजार करना होगा। लेकिन गांव वालों का आरोप है कि मदन लंबे समय से वहां श्रमिक के रूप में काम कर रहा था, जिसे प्रशासन ने अनदेखा किया।

राजसमंद मुर्दाघर के बाहर का दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने के लिए काफी था। परिजनों का आरोप है कि पूरे दिन ठेकेदार और पूंजीपति वर्ग के लोग वहां डेरा डाले रहे और मदन के शव को आधार बनाकर 'समझौते' की बोली लगाते रहे। यह मदद की पेशकश कम और माइंस संचालक व प्रबंधन को कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए 'चुप रहने की कीमत' अधिक लग रही थी। आंसुओं से भीगी आंखों के सामने पैसों के बंडल लहराकर इंसाफ को दबाने की यह कोशिश सिस्टम के उस चेहरे को उजागर करती है जहाँ गरीब की जान से ज्यादा रसूखदारों का मुनाफा कीमती होता है।

इस पूरे प्रकरण ने न केवल पुलिस और प्रशासन, बल्कि माइनिंग विभाग की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। क्या माइंस का नियमित निरीक्षण हो रहा था? किसके आदेश पर पुलिस को सूचना देने में देरी की गई? और क्या प्रशासनिक आंखें जानबूझकर मूंदी गई थीं? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब अब राजसमंद का आम नागरिक मांग रहा है। केलवा थाना क्षेत्र में इस घटना के बाद व्याप्त भारी आक्रोश यह स्पष्ट कर रहा है कि अब जनता केवल जांच का आश्वासन नहीं, बल्कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई चाहती है। मदन भील की मौत ने खनन क्षेत्रों में व्याप्त अराजकता और श्रमिक सुरक्षा की खोखली सच्चाई को एक बार फिर प्रदेश की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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Pratahkal Newsroom

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