राजसमंद: तेरापंथ के द्वितीय अधिशास्ता आचार्य भारमल की 205वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धा और भक्ति का सैलाब
राजसमंद के केलवा स्थित तेरापंथ उद्गम स्थल अंधेरी ओरी में आचार्य भारमल की 205वीं पुण्यतिथि भव्य रूप से मनाई गई। मुनि प्रकाश कुमार और मुनि प्रसन्न कुमार ने आचार्य भारमल के चमत्कारी व्यक्तित्व और आचार्य भिक्षु के प्रति उनके समर्पण पर प्रकाश डाला। केलवा जैन समाज के इस गौरवशाली इतिहास और यक्षदेव के भक्त बनने के प्रसंग को जानने के लिए पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

केलवा। राजस्थान की पावन धरा राजसमंद के ऐतिहासिक नगर केलवा में स्थित तेरापंथ उद्गम स्थल 'अंधेरी ओरी' के प्रांगण में एक आध्यात्मिक उत्सव का वातावरण उस समय जीवंत हो उठा, जब तेरापंथ धर्मसंघ के द्वितीय आचार्य भारमल की 205वीं पुण्यतिथि अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाई गई। यह वही पवित्र स्थान है जिसे तेरापंथ की नींव का आधार माना जाता है और जहाँ आज भी इतिहास की गौरवशाली स्मृतियाँ सुरक्षित हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुनि प्रीत कुमार के सुमधुर मंगलाचरण और गीत प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसने उपस्थित जनसमूह को भक्ति के आनंद में सराबोर कर दिया। सभा को संबोधित करते हुए मुनि प्रकाश कुमार ने आचार्य भारमल के विराट व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्हें एक 'चमत्कारी संत' की संज्ञा दी। उन्होंने बताया कि किस प्रकार आचार्य भारमल के आध्यात्मिक प्रभाव ने पूरे केलवा के जैन समाज को भक्ति के मार्ग पर अग्रसर किया। मुनि ने भावपूर्ण प्रसंग सुनाते हुए कहा कि मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में अपने पिता किशनो जी के साथ आचार्य भिक्षु के चरणों में दीक्षा ग्रहण करने वाले बालक भारमल की विनम्रता, सामर्थ्य और अटूट समर्पण भाव को देखकर ही प्रवर्तक आचार्य भिक्षु ने उन्हें अपना परम विश्वस्त शिष्य बनाया और कालांतर में धर्मसंघ का उत्तराधिकार सौंपा।
इसी क्रम में मुनि प्रसन्न कुमार ने कहा कि आचार्य भिक्षु और आचार्य भारमल सत्य एवं धर्म क्रांति के वे पुरोधा थे जिन्होंने समाज को एक नई दिशा प्रदान की। उन्होंने 'अंधेरी ओरी' के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि महापुरुषों के चरण जहाँ पड़ते हैं, वहाँ भय और अमंगल का नाश हो जाता है और अभय व मंगल का उदय होता है। चंद्रप्रभु भगवान के प्राचीन मंदिर से जुड़े एक विस्मयकारी प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि यक्षदेव भी आचार्य भारमल के प्रभाव से भक्त बन गया था, जिसके बाद संपूर्ण केलवा जैन समाज उनके सिद्धांतों का अनुयायी बन गया।
कार्यक्रम के दौरान तेरापंथ सभा के मंत्री ललित मेहता और उपाध्यक्ष पूरण गांग ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए आचार्य भारमल के योगदान को अविस्मरणीय बताया। पूरे समारोह का कुशल संचालन मुनि सिद्धप्रज्ञ द्वारा किया गया। यह आयोजन न केवल एक महापुरुष को श्रद्धांजलि देने का माध्यम बना, बल्कि इसने वर्तमान पीढ़ी को धर्मसंघ की गौरवशाली जड़ों और 'अंधेरी ओरी' की आध्यात्मिक ऊर्जा से पुनः जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

Pratahkal Bureau
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