राजसमंद: करोड़ों के बजट के बाद भी बूंद-बूंद को तरसती 'भोपजी की भागल', हाईवे पर दांव पर लगी है ग्रामीणों की जिंदगी
राजसमंद के चारभुजा में करोड़ों की योजनाओं के बाद भी भोपजी की भागल में पेयजल संकट बरकरार है। प्यास बुझाने के लिए ग्रामीण हाईवे पर जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं, जिसके विरोध में जनप्रतिनिधि बख्तावर गुर्जर सेवक ने जूते-चप्पल त्याग दिए हैं। इस गंभीर समस्या और प्रशासन की अनदेखी पर आधारित विशेष रिपोर्ट।

राजसमंद। जल जीवन मिशन और करोड़ों की पेयजल योजनाओं के दावों के बीच राजस्थान के राजसमंद जिले से एक विचलित करने वाली तस्वीर सामने आई है। चारभुजा पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 'भोपजी की भागल' बस्ती में आज भी विकास की धारा प्यास बुझाने में नाकाम साबित हो रही है। यहाँ के ग्रामीण भीषण पेयजल संकट के चलते न केवल शारीरिक कष्ट झेल रहे हैं, बल्कि हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर पानी का इंतजाम करने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि सरकारी फाइलों में योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन धरातल पर घड़े आज भी खाली हैं।
इस बस्ती की महिलाओं और बच्चों की दिनचर्या सूरज उगने के साथ ही संघर्षपूर्ण हो जाती है। बुजुर्ग महिलाएं और छोटे बच्चों को साथ लेकर ग्रामीण करीब दो किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर पानी लाने को विवश हैं। सबसे भयावह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब इन ग्रामीणों को सिर पर भारी मटके रखकर तेज रफ्तार वाहनों से भरे नेशनल हाईवे को पार करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सफर केवल थकावट भरा नहीं है, बल्कि मौत को बुलावा देने जैसा है। हाईवे पर पहले भी कई छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, जिसके कारण अब पानी भरना केवल एक मजबूरी नहीं, बल्कि एक जानलेवा जोखिम बन चुका है।
प्रशासनिक उदासीनता और कागजी विकास के खिलाफ अब जनप्रतिनिधियों का सब्र भी जवाब दे गया है। इस गंभीर समस्या के विरोध में भोपजी की भागल के स्थानीय जनप्रतिनिधि बख्तावर गुर्जर सेवक (चारभुजा मंदिर) ने एक कठोर और भावुक संकल्प लिया है। उन्होंने व्यवस्था को आईना दिखाते हुए अपने जूते-चप्पल त्याग दिए हैं। बख्तावर गुर्जर का कहना है कि जब तक गांव के हर घर तक पानी की पाइपलाइन नहीं पहुँचती और ग्रामीणों को इस नारकीय स्थिति से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक वे नंगे पैर ही रहेंगे। उनका यह संकल्प केवल एक प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों को जगाने की एक चेतावनी है जो बंद कमरों में बैठकर विकास के दावे करते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, राहुल आचार्य द्वारा रेखांकित यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है। बार-बार गुहार लगाने के बावजूद प्रशासन की ओर से केवल आश्वासन ही मिले हैं। अब ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस पेयजल संकट का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया और गांव तक सुरक्षित जलापूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई, तो वे उग्र आंदोलन की राह चुनने को विवश होंगे। करोड़ों की लागत वाली योजनाओं की विफलता ने न केवल सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जब तक बुनियादी सुविधाओं के लिए आम आदमी को हाईवे पर जान जोखिम में डालनी पड़ेगी, तब तक विकास के सारे दावे खोखले ही रहेंगे।

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