खमनोर (राजसमंद)। भारत वर्ष के समस्त पेंशनर्स के हित में "अखिल भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ, नई दिल्ली" के आव्हान पर राजस्थान पेंशनर समाज, उपशाखा खमनोर (राजसमन्द) द्वारा एक महत्वपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। राजस्थान पेंशनर समाज के अध्यक्ष सुमन लाल आमेटा के नेतृत्व में पेंशनर्स ने वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पेंशनर्स के विरुद्ध जारी "वैधता अधिनियम 2025" को वापस लेने के संबंध में तहसीलदार खमनोर के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नाम ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन पत्रांक 6 दिनांक 25 मार्च 2026 को प्रस्तुत किया गया, जिसमें भारत की संचित निधि से पेंशन देनदारियों पर व्यय हेतु केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमों और सिद्धांतों के सत्यापन के संदर्भ में गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं।

विवादास्पद अधिनियम और पेंशनर्स की आपत्तियां

महोदय, उपर्युक्त विषयक संदर्भित पत्र के संबंध में आपका ध्यान आकृष्ट करते हुए अनुरोध है कि एक ऐसा अधिनियम जो इस सिद्धांत को मान्यता देता है कि केंद्र सरकार को अपने पेंशनर्स का वर्गीकरण करने और उनके बीच अंतर बनाए रखने का अधिकार है, वह 29 मार्च 2025 को जारी नोटिफिकेशन से लागू हो गया है। इसे बिना पूर्व सूचना के वित्त विधेयक के भाग के रूप में पेश किया गया और 25 मार्च 2025 को लोकसभा द्वारा अनुमोदित कर दिया गया है। यदि यह अधिनियम अक्षरशः लागू होता है तो पेंशन भोगियों की सेवा निवृत्ति की तिथि, पेंशन पात्रता के संबंध में वर्गीकरण और उनके बीच अंतर का आधार होगा, जिससे केंद्रीय वेतन आयोग के कार्यकाल से पहले के पेंशनर्स वेतन आयोग की सिफारिशों के लाभ से वंचित हो जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के 'नाकरा फैसले' का हवाला

मौजूदा पेंशन भोगियों को इस कठिन समय में पेंशन वृद्धि का लाभ ना मिलने के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। महोदय, यह सरकार के घोषित उद्देश्यों के विरुद्ध है कि वह अपने सभी नागरिकों को सामाजिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करती है। यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णयों के भी विरुद्ध है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली ने न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के डी० एस० नाकरा और अन्य बनाम भारत संघ मामले में सिविल याचिका संख्या 5939--41 /1980 में अपने ऐतिहासिक फैसले में जिसे नाकरा फैसला के नाम से जाना जाता है, कहा था-- "पेंशन एक सामाजिक कल्याणकारी व्यवस्था है, जो उन लोगों को सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करती है, जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में नियोक्ता के लिए अथक प्रयास किया है, इस आश्वासन के साथ कि वृद्धावस्था में उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ा जाएगा।"

आठवें वेतन आयोग में समानता की मांग

इस निर्णय में यह भी स्पष्ट किया गया था कि पेंशन योजना का उद्देश्य पेंशन भोगियों को अभाव मुक्त, सम्मानजनक, स्वतंत्र और सेवानिवृत्ति से पहले के स्तर के समकक्ष जीवन स्तर प्रदान करना है। यह अधिनियम 01-01-2026 से पहले सेवानिवृत हुए मौजूदा पेंशनरों को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। अतः हम निवेदन करते हैं कि जिस प्रकार सातवें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा 01-01-2016 से पहले सेवानिवृत हुए और 01-01- 2016 को या उसके बाद सेवानिवृत हुए पूर्व पेंशनरों के बीच समानता की सिफारिश की गई थी और केंद्र सरकार द्वारा वर्ष जनवरी 2016 से इसे स्वीकार किया गया था, उसी प्रकार आठवें केंद्रीय वेतन आयोग में भी इस सिद्धांत को यथावत रखा जावे।

देशव्यापी काला दिवस और अधिसूचना वापसी की अपील

वित्त विधेयक के रूप में यह काला अधिनियम लोकसभा में 25 मार्च 2025 को पारित हुआ था जिसे जारी हुए 1 वर्ष पूरा हो रहा है। अतः इस अधिनियम के विरोध में अखिल भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ दिल्ली ने भारतवर्ष के समस्त राज्यों में 25 मार्च 2026 को काला दिवस मनाने का निर्णय लिया है। यह कदम इस कुख्यात अधिनियम के कारण उत्पन्न हमारी परेशानियों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करने के लिए उठाया गया है। अतः उक्त अधिनियम के विरोध में राजस्थान पेंशनर समाज द्वारा भी 25 मार्च 2026 को काला दिवस के रूप में मानते हुए माननीय प्रधानमंत्री जी के नाम ज्ञापन प्रस्तुत कर अनुरोध है कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम से संबंधित वित्त मंत्रालय द्वारा दिनांक 29 मार्च 2025 को जारी अधिसूचना को तत्काल वापस लेने के संबंध में आदेश जारी कर पेंशनर्स को राहत प्रदान करने का कष्ट करें। पेंशनर समुदाय इसके लिए आपका सदा आभारी रहेगा।

इस अवसर पर अध्यक्ष सुमन लाल आमेटा के साथ तुलजा शंकर श्रीमाली, शंकर सिंह राजपूत, सुरेश चंद्र श्रीमाली, प्रेम शंकर माली, प्रेम शंकर श्रीमाली, मगन लाल रेगर, मदन लाल रेगर, कमलेश श्रीमाली, नाथु सिंह राजपूत, देवीलाल माली और अन्य पेंशनर्स उपस्थित रहे।

Pratahkal Bureau

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