खमनोर। हल्दीघाटी के उस ऐतिहासिक प्रांगण में, जहां की मिट्टी महाराणा प्रताप के शौर्य और बलिदान की गवाह रही है, वहां आज एक अलग तरह की तड़प और आक्रोश देखने को मिला। खमनोर के सुप्रसिद्ध रक्ततलाई प्रांगण में आयोजित एक विशेष संगोष्ठी और पुष्पांजलि कार्यक्रम के दौरान क्षेत्र के विकास को लेकर सरकार की उदासीनता पर तीखे सवाल खड़े किए गए। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की स्मृति को नमन करने जुटे प्रबुद्धजनों और युवाओं ने एक सुर में कहा कि घोषणाओं का अंबार तो लगा है, लेकिन धरातल पर आज भी सन्नाटा पसरा हुआ है।

कार्यक्रम का आगाज महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर किया गया, जिसके बाद संगोष्ठी में वक्ताओं ने एक-एक कर विकास की जमीनी हकीकत बयां की। हल्दीघाटी नवयुवक मंडल के पूर्व अध्यक्ष चेतन पंवार ने अपने संबोधन में सीधा प्रहार करते हुए कहा कि हल्दीघाटी और रक्ततलाई जैसे विश्वविख्यात ऐतिहासिक स्थलों का कायाकल्प केवल सरकारी फाइलों और कागजों तक सिमट कर रह गया है। उन्होंने प्रशासन और सरकार को चेताते हुए कहा कि जमीनी स्तर पर अपेक्षित कार्य न होने से पर्यटकों और गौरवशाली इतिहास को सहेजने की मुहिम को धक्का लग रहा है।

वहीं, जय हल्दीघाटी नवयुवक मंडल के अध्यक्ष गोपेश माली ने युवाओं को महाराणा प्रताप के जीवन संघर्ष से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। इसी कड़ी में जय मेवाड़ नवयुवक मंडल के अध्यक्ष हेमंत सिंह मोजावत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि महाराणा प्रताप के नाम पर वोट बैंक की राजनीति अब बंद होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रताप केवल एक नाम नहीं बल्कि एक आदर्श हैं, जिन्हें आत्मसात करने की आवश्यकता है, न कि राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करने की। गोष्ठी के दौरान विनोद पालीवाल, केसरसिंह गौड़, बसंतीलाल लोढ़ा, किशन कटारा और समिति अध्यक्ष नवनीत पालीवाल ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने हाल के दिनों में महाराणा प्रताप को लेकर की जा रही अनर्गल बयानबाजी पर कड़ा रोष व्यक्त किया और सरकार से ऐसी बयानबाजी पर तत्काल रोक लगाने की मांग की, ताकि समाज और इतिहास की मर्यादा अक्षुण्ण बनी रहे।

संगोष्ठी में इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया कि भविष्य की किसी भी विकास योजना में स्थानीय संगठनों की भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए। वक्ताओं ने आह्वान किया कि रक्ततलाई के समग्र विकास के लिए अब सभी संगठनों और आम नागरिकों को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा। इस गरिमामयी अवसर पर हल्दीघाटी संग्रहालय के संस्थापक निदेशक भूपेंद्र श्रीमाली, रमेश पालीवाल, भंवरसिंह चुंडावत, दुर्गाशंकर पालीवाल, सोहनलाल माली, पारस जैन, उदयलाल गुर्जर, पुष्कर प्रजापत और प्रतीक माली सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी मौजूद रहे। कार्यक्रम का समापन एक संकल्प के साथ हुआ कि जब तक रक्ततलाई को उसका वास्तविक सम्मान और विकास नहीं मिल जाता, यह आवाज दबने वाली नहीं है।

Pratahkal Newsroom

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