हल्दीघाटी की ऐतिहासिक धरोहर पर अतिक्रमण और प्रशासनिक उपेक्षा की मार
राजस्थान उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद भी खमनोर में अधूरा अतिक्रमण हटाओ अभियान, स्थानीय प्रशासन और पर्यटन माफिया की मिलीभगत के गंभीर आरोप।

खमनोर स्थित हल्दीघाटी दर्रे का वह ऐतिहासिक मार्ग जो वर्तमान में अतिक्रमण और प्रशासनिक उदासीनता के कारण अपना मूल स्वरूप खोता जा रहा है।
खमनोर (प्रातःकाल संवाददाता)। मेवाड़ के स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप की कर्मभूमि हल्दीघाटी आज संरक्षण के अभाव और प्रशासनिक उदासीनता से जूझ रही है। जिस धरती पर प्रताप ने महल छोड़कर जंगल में संघर्ष किया और मुगलों के आगे सिर नहीं झुकाया, वही ऐतिहासिक धरोहर अब अतिक्रमण, राजनीति और उपेक्षा की भेंट चढ़ रही है।
विकास की घोषणाएं, धरातल पर शून्य
आज़ादी के बाद राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने निजी कोष से खमनोर से चेतक समाधि तक सड़क बनवाई थी। 1976 में हल्दीघाटी युद्ध की 400वीं वर्षगांठ पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेवाड़ कॉम्प्लेक्स योजना की नींव रखी और उदयपुर-नाथद्वारा मार्ग का निर्माण कराया। 1997 में भैरोंसिंह शेखावत सरकार ने वैकल्पिक मार्ग बनाकर ऐतिहासिक दर्रे को संरक्षित करने का प्रयास किया। लेकिन इसके बाद विकास की गति थम गई। कभी दो किलोमीटर तक फैला हल्दीघाटी का तंग दर्रा अब सिमट कर अतिक्रमण की चपेट में है।
न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद भी कार्रवाई अधूरी
हल्दीघाटी और रक्ततलाई की बदहाली पर राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लिए जाने के बाद फरवरी 2026 में खमनोर कस्बे में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई। लेकिन यह कार्रवाई बिना किसी ठोस योजना के नालियों तक सीमित रह गई और इसका सीधा लाभ ऐतिहासिक भूमि पर कब्जा करने वालों को मिला। 2007 से पहाड़ियों और चारागाह भूमि पर कब्जे का मामला अब भी ठंडे बस्ते में है।
घोषणाएं और प्रशासन की भूमिका
केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा रक्ततलाई में 5 करोड़ रुपये की लागत से संग्रहालय बनाने की घोषणा के बावजूद धरातल पर कोई काम शुरू नहीं हुआ। वहीं, 1993 में जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित महाराणा प्रताप स्मृति संस्थान भी बलीचा स्थित राष्ट्रीय स्मारक की दुर्दशा पर मौन है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पंचायत समिति के अधिकारी महाराणा प्रताप जयंती जैसे आयोजनों में अतिक्रमणकारी पर्यटन माफिया से आर्थिक सहयोग लेकर अनदेखी करते हैं। संरक्षण की मांग उठाने वाले युवा मंडलों को भी आर्थिक मदद देकर चुप करा दिया जाता है। वीआईपी दौरों के दौरान हल्दीघाटी के नाम पर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है, जबकि असली धरोहर उपेक्षित रह जाती है।
स्वच्छता और इतिहास की अनदेखी
पिछले एक दशक में नालियों के निर्माण पर लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद हालात जस के तस हैं। स्वच्छ भारत मिशन भी हल्दीघाटी में केवल कागज़ों तक सिमटा नजर आता है। 18 जून 1576 (वि.सं. 1633, आषाढ़ कृष्ण सप्तमी) को इसी रक्ततलाई की धरती पर महाराणा प्रताप ने 3 हजार घुड़सवार, 2 हजार पैदल, 100 भालेदार और 100 गजराज के साथ आमेर के राजा मानसिंह के नेतृत्व वाली मुगल सेना को बनास पार खदेड़ा था। उन्होंने हरावल दस्ते का नेतृत्व हकीम खां सूरी को सौंपकर मानवता की मिसाल पेश की थी। हकीम खां के बलिदान के बाद स्वयं प्रताप ने सेना का नेतृत्व किया। आज वही स्मारक राजनीति और उपेक्षा के बीच घुट रहे हैं, और स्थानीय लोग कहते हैं कि "हादसा यह नहीं कि हल्दीघाटी के साथ यह हुआ… हादसा यह है कि सब जानकर भी प्रताप भक्त मौन हैं।"

Pratahkal Bureau
प्रातःकाल ब्यूरो, प्रातःकाल न्यूज़ की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा ब्यूरो राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।
